दिवालिया समाधान फर्मों के शेयर टूटे

पवन बुरुगुला और अद्वैत राव पलेपू | मुंबई May 29, 2018 10:10 PM IST

दिवालिया समाधान वाली कंपनियों के शेयर पर दांव लगाने वाले निवेशक फंस गए हैं। पिछले साल दिवालिया कार्यवाही की ओर बढऩे वाली कंपनियों के शेयर निवेशकों ने इस उम्मीद में खरीदे थे कि इनके कारोबार में सुधार होगा। इस आशावाद से इन शेयरोंं में 30 से 40 फीसदी की तेजी दर्ज हुई थी।हालांकि पिछले कुछ महीनों से इन कंपनियों के शेयर ढलान पर हैं क्योंकि उम्मीद के मुताबिक इन कंपनियों का कायापलट नहीं हो पाया है। समाधान प्रक्रिया पर अनिश्चितता, इसमें लगातार हो रही देरी और ट्रेडिंग पर लगाम के डर ने निवेशकों को नुकसान पर शेयर बेचने के लिए प्रोत्साहित किया है। 

आईबीसी के दायरे में आने वाली कंपनियों की पहली सूची आरबीआई ने जून 2017 में जारी की थी। दबाव वाली 12 कंपनियां इस सूची में थी, जिनके बकाए कर्ज का समाधान 31 दिसंबर से पहले होना था या फिर उसे नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में कार्यवाही का सामना करना था। शुरू में बाजार के भागीदारों को उम्मीद थी कि इन फर्मों की वित्तीय बोली की प्रक्रिया जनवरी 2018 तक पूरी हो जाएगी और इसके अगले छह महीने में इनके कारोबार का कायापलट हो जाएगा। इन वजहों से निवेशकों ने ऐसे शेयरों में भारी निवेश किया।

चूड़ीवाला सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक आलोक चूड़ीवाला ने कहा, यह पूरी तरह से सटोरिया कारोबार था क्योंकि निवेशकों ने तब अप्रत्याशित लाभ की उम्मीद थी जब इन कंपनियोंं का कायापलट होता। हालांकि ऐसा आसान नहीं होता है। अगर कोई कंपनी आईबीसी में जाती है तो इसका मतलब यह है कि कंपनी दिवालिया है और इसके कायापलट की काफी कम संभावना है। ऐसे में निवेशकों को इस तरह के निवेश के फैसले से खुद को रोकना चाहिए था। जेपी इन्फ्राटेक का शेयर अक्टूबर-दिसंबर 2017 के बीच 68 फीसदी चढ़ा था। इस साल यह शेयर कई अप्रत्याशित प्रगति के बीच 75 फीसदी टूटा है। आईबीसी के दायरे में आने वाली यह पहली रियल एस्टेट कंपनी थी, जिसने ट्रिब्यूनल को फ्लैट के मालिकों व उनके अधिकार को लेकर नई मिसाल सामने रखना अपरिहार्य बना दिया। 

 

दूसरा उदाहरण स्टील निर्माता मोनेट इस्पात ऐंड एनर्जी का है, जहां 2018 में इसके शेयर पर भारी चोट पड़ी है। बड़े डिफॉल्टरों की सूची वाली आरबीआई की पहली सूची में यह कंपनी शामिल थी और पिछले साल इसे एनसीएलटी के दायरे में लाया गया था। इसके कायापलट की उम्मीद से इसका शेयर 20 फीसदी चढ़ा था। हालांकि आर्सेलरमित्तल और जेएसडब्ल्यू जैसी बोलीदाता के बीच कानूनी संघर्ष के चलते इसकी दिवालिया प्रक्रिया में देर हुई। इस साल इसका शेयर 49 फीसदी टूटा है। भूषण स्टील, आलोक इंडस्ट्रीज और एमटेक ऑटो का शेयर भी 2018 के दौरान 45 से 55 फीसदी तक टूटा है।

 

आईबीसी के तहत पक्षकारों से दबाव वाली कंपनियों का कर्ज समाप्त करने और 270 दिन की समयसीमा के भीतर कायापलट की योजना तैयार करनी होती है। हालांकि कई कानूनी व परिचालन संबंधी मसले के चलते समयसीमा का पालन नहीं हो पाया। विशेषज्ञोंं ने कहा कि वास्तव में कायापलट में तीन साल लग सकते हैं क्योंंकि नए प्रबंधकों को कार्यभार संभालने के बाद योजना का क्रियान्वयन होगा।

 

अद्वैत लीगल के पार्टनर सुबोध सदाना ने कहा, 270 दिन की समयसीमा छोटे कर्जदार के लिए ठीक है, लेकिन मेरा मानना है कि बड़े कर्जदार के लिए यह अवधि काफी छोटी है। आकार बड़ा होने के कारण कई जटिलताएं होती हैं।  सेबी की पिछली बोर्ड बैठक में आईबीसी के दायरे में आने वाली कंपनियों के शेयर ट्रेडिंग पर पाबंदी का प्रस्ताव रखा गया था ताकि सटोरिया कारोबार पर लगाम कसा जा सके। 
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