घर के खरीदार होंगे वित्तीय लेनदार

वीण मणि और किरण राठी | नई दिल्ली Jun 06, 2018 09:48 PM IST

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में संशोधन के लिए अध्यादेश के कई प्रावधानों को बुधवार को लागू कर दिया गया है, लेकिन समाधान योजना की मंजूरी के लिए लेनदारों की समिति (सीओसी) में वोटिंग के प्रतिशत में अनिवार्य कमी पूर्वप्रभावी होगी। अध्यादेश में कहा गया है कि वोटिंग प्रतिशत मौजूदा 75 प्रतिशत से घटकर न्यूनतम 66 प्रतिशत होगा।  इसका मतलब है कि दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रहे मौजूदा मामले भी इस प्रावधान के दायरे में आएंगे। विश्लेषकों का कहना है कि यह उन कंपनियों के लिए लागू होगा जिनके लिए समाधान के लिए 270 दिन की समय-सीमा समाप्त नहीं हुई हो।
 
मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृति के दो सप्ताह बाद राष्टï्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा इस अध्यादेश को मंजूरी प्रदान की गई है क्योंकि इसमें कुछ खामियां थीं। अध्यादेश में घर खरीदारों को वित्तीय ऋणदाताओं के समान रखा गया है और उन्हें दोषी बिल्डरों को एनसीएलटी में घसीटने का अधिकार दिया गया है। घर खरीदार अब लेनदारों की समिति का हिस्सा होंगे। एनसीएलटी को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा सुझाए गए 12 मामलों में भी यह संशोधन इरा इन्फ्रा के लिए भी लागू होगा क्योंकि उसका मामला एनसीएलटी द्वारा स्वीकार किया गया है। अन्य मामले 270 दिन की समय-सीमा पहले ही पूरी कर चुके हैं। समाधान प्रक्रिया 80 दिन की विस्तार अवधि के साथ एनसीएलटी में पहुंचने के 180 दिन के अंदर पूरी करनी होगी। 
 
समाधान प्रक्रिया को मंजूरी के लिए सीओसी में जरूरी वोट प्रतिशत के मुद्दे को लेकर वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) और कंपनी मामलों का मंत्रालय (एमसीए) समेत अन्य के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई थी। हालांकि इसे लेकर सहमति बनी थी कि वोटिंग प्रतिशत मौजूदा 75 से घटाकर न्यूनतम 66 प्रतिशत किया जाएगा, लेकिन डीएफएस चाहता था कि मौजूदा मामले इससे अलग रहें। हालांकि अध्यादेश में कहा गया है कि मौजूदा मामले भी इसके दायरे में आएंगे।अध्यादेश में यह भी कहा गया है कि कंपनियों को समाधान प्रक्रिया शुरू होने से पहले तीन-चौथाई शेयरधारकों की मंजूरी की जरूरत होगी। धीर एंड धीर एसोसिएटï्स में वरिष्ठï पार्टनर नीलेश शर्मा का कहना है कि मौजूदा समय में दिवालिया संहिता के तहत यह नियम है कि दिवालिया प्रक्रिया के लिए कंपनी को शेयरधारकों की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसे एनसीएलटी में जाने के मुद्दे पर बोर्ड में चर्चा करनी होती है। 
 
यदि कोई कंपनी एनसीएलटी में स्वीकृति के बाद अपना आवेदन वापस लेना चाहती है तो उसे 90 प्रतिशत शेयरधारकों की मंजूरी लेने की जरूरत होगी। अध्यादेश में आईबीसी की उस धारा 29ए में ढील दी गई है, जो एक साल से अधिक समय तक फंसे कर्ज की समस्या से जूझ रहे प्रवर्तकों और संबंधित पक्षों को बोली प्रक्रिया से रोकती है। इस उद्देश्य के लिए एक अलग धारा जोड़ी जाएगी। लगभग 70 प्रतिशत कंपनियां इस श्रेणी में आती हैं। इससे पहले सरकार ने दिवालिया प्रवर्तकों और संबंधित पक्षों को दिवालिया कंपनियों को लेने से रोकने के लिए आईबीसी में धारा 29ए शामिल की थी। धारा 29ए में संबंधित पक्ष की परिभाषा भी संक्षिप्त की गई है।  केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आईबीसी में संशोधन को मंजूरी पहले ही दे दी थी। इस संशोधन से घर खरीदारों को दिवालिया प्रक्रिया की स्थिति में वित्तीय लेनदारों का दर्जा मिला है। 
कीवर्ड IBC, code, IBBI, NCLT, RBI,

  
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