एफपीआई की राह आसान बनाएगा आरबीआई

पवन बुरुगुला और अनूप रॉय | मुंबई Jun 14, 2018 09:45 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक 27 अप्रैल के परिपत्र में प्रस्तावित नए नियमों में से कुछ पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को राहत देने की योजना बना रहा है। नए नियम के मुताबिक, एफपीआई अपने पोर्टफोलियो का 20 फीसदी से ज्यादा उन प्रतिभूतियोंं में निवेश नहीं कर सकते जिसकी परिपक्वता अवधि 1 साल से कम हो। इस संबंध में आरबीआई मौजूदा निवेश के लिए ग्रैंडफादरिंग पर विचार कर रहा है क्योंकि अभी कानून पिछली तारीख से लागू किया गया है। ग्रैंडफादरिंग के तहत पुराने नियम तब तक लागू रहते हैं जब तक कि नए उपबंध लागू न हो जाएं। इसके अलावा एफपीआई पर प्रतिबंध है कि वह किसी गैर-परिवर्तनीय ऋणपत्र में 50 फीसदी से ज्यादा निवेश नहींं कर सकता और इसमें भी एफपीआई को राहत मिल सकती है। निजी क्षेत्र में ज्यादातर रकम निजी नियोजन के जरिए जुटाई जाती है। साल 2017-18 में कंपनियों ने निजी नियोजन के जरिए 5.34 लाख करोड़ रुपये जुटाए, जो 2016-17 में 6.40 लाख करोड़ रुपये रहा था। यह जानकारी सेबी के आंकड़ों से मिली।
 
बॉन्ड की व्यवस्था करने वालों का कहना है कि बॉन्ड में द्विपक्षीय सौदे आम हैं और कभी-कभार दो या तीन एफपीआई पूरी ऋण प्रतिभूति उठा लेते हैं। इस पर सीमा लगाने का मतलब यह होगा कि इश्यू करने वालों को कई एफपीआई से बात करनी होगी और यहां तक उसे बुक बिल्डिंग प्रक्रिया भी अपनानी पड़े, जो छोटी इकाइयों के लिए उपयुक्त नहीं है। एफपीआई ऐसे सौदे के प्रति आकर्षित होते हैं क्योंकि बड़ी परियोजनाओं के लिए ब्याज दर 18 फीसदी तक हो सकती है। छोटी कंपनियों के लिए खास तौर से रियल एस्टेट कंपनियों के लिए रेटिंग मोटे तौर पर कयास वाली श्रेणी के होते हैं। इसके अलावा इन कंपनियों को बैंकों से कर्ज नहीं मिलता। उनके लिए ब्याज दर काफी ज्यादा है। इन कंपनियों के लिए उनके एनसीडी के लिए एफपीआई की व्यवस्था संभव नहीं है।
 
इस मामले पर वित्त मंत्रालय, आरबीआई और सेबी के अधिकारियों की बैठक में पिछले हफ्ते चर्चा हुई। कई विदेशी फंडों ने नए नियम पर चिंता जताई है। सूत्रों ने कहा कि केंद्रीय बैंक अन्य विवादास्पद नियमों में नरमी पर भी विचार कर सकता है। इस बारे में जानकारी के लिए आरबीआई को भेजे गए ईमेल का जवाब नहीं मिला। बाजार के भागीदारों ने कहा, 1 साल से कम परिपक्वता अवधि वाले बॉन्डों पर 20 फीसदी की सीमा जानबूझकर नहीं लगाई गई थी। आरबीआई ने इस प्रावधान को नए नियम के कवच के तौर पर लागू किया था। 27 अप्रैल के परिपत्र से पहले एफपीआई उन्हीं सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश कर सकते थे जिनकी परिपक्वता अवधि कम से कम तीन साल बची हुई हो। तीन साल की सीमा जुलाई 2014 में लागू की गई थी ताकि लंबी अवधि के निवेशकों को आकर्षित किया जा सके और उनके पोर्टफोलियो की बिक्री से रुपया अस्थिर न होने पाए। अप्रैल के परिपत्र ने पुराने नियम को बहाल कर दिया है, लेकिन 20 फीसदी की सीमा नई है।
 
एक सूत्र ने कहा, कई एफपीआई ने नए नियमों पर चिंता जताई है। 20 फीसदी की सीमा से कई एफपीआई को कुछ मौजूदा निवेश निपटाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। ऐसे निवेश की ग्रैंडफादरिंग से विदेशी फंडों की परेशानी कम हो जाएगी। किसी कॉरपोरेट बॉन्ड का आधा से ज्यादा हिस्सा एफपीआई नहीं ले सकता, इससे कई सौदे पटरी से उतर गए, खास तौर से रियल एस्टेट व बुनियादी ढांचा क्षेत्र में। इन क्षेत्रों की कंपनियों को स्ट्रक्चर्ड एनसीडी के जरिए रकम जुटानी पड़ी, जो एकल रणनीतिक निवेशक को लक्षित होते हैं। सूत्रों ने कहा, नए परिपत्र से इन क्षेत्रों में 30 से ज्यादा सौदे अटक गए। निजी नियोजन वाला एनसीडी बाजार इन नए नियमों से काफी ज्यादा प्रभावित हुआ है। भारत में सार्वजनिक एनसीडी बाजार के मुकाबले निजी एनसीडी का बाजार काफी बड़ा है। 
कीवर्ड FPI, RBI,

  
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