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अंतरराष्ट्रीयता का पतन

श्याम सरन |  May 13, 2018 09:31 PM IST

अंतरराष्ट्रीयता के बगैर राष्ट्रवाद एक बंद गली की तरफ जाने वाले रास्ते पर चलने जैसा है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन

 
हम अपने दौर के एक अजीब विरोधाभास का सामना कर रहे हैं। दुनिया एक-दूसरे से बेहद करीब से जुड़ चुकी है, देशों और नागरिकों के तौर पर हमारी नियति भी पहले से ज्यादा अंतर्संबद्ध है और तमाम क्षेत्रों एवं राष्ट्रीय सीमाओं से परे पेश आ रही चुनौतियां मानवीय इतिहास में अभूतपूर्व हैं। राष्ट्र-राज्य मजबूती से डंटे हुए हैं और निकट भविष्य में भी वे ऐसे ही बने रहेंगे। हालांकि राष्ट्र-राज्य की संकल्पना के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी राष्ट्रीय संप्रभुता की अवधारणा घरेलू एवं बाह्य परिवेश के बीच विभाजक रेखा के अप्रासंगिक होते जाने से तेजी से अनुकूलित बल्कि सीमित होती जा रही है। हमारी किस्मत अपने देश से काफी दूर हो रही घटनाओं से प्रभावित होती है और 2007-08 की वैश्विक आर्थिक मंदी के समय हमें इसका पीड़ादायक अनुभव भी हो चुका है। अफ्रीका के किसी  दूरदराज वाले इलाके में जन्मी महामारी देखते ही देखते दुनिया भर में फैल सकती है। एक वैश्विक परिघटना होते हुए भी जलवायु परिवर्तन हरेक देश स्थानीय असर ही डालती है। प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदाएं तेजी से राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर जाती हैं। राष्ट्रों की शासन संरचनाएं इन नतीजों से निपट पाने के लिए काफी नहीं रह गई हैं।
 
डिजिटल प्रौद्योगिकी के जरिये एक-दूसरे से जुड़ी समूची दुनिया, संचार की तीव्र रफ्तार और राज्यों के नियंत्रण से बाहर होती जा रही सोशल मीडिया की बढ़ती पहुंच एवं प्रभाव ने नियमन से बाहर हो रहे क्षेत्रों का दायरा काफी बढ़ा दिया है। अपनी मूल प्रकृति के चलते ये तकनीकी साधन राष्ट्रीय नियंत्रण और नियमन के अधीन नहीं हैं या न के बराबर हैं। त्वरित तकनीकी बदलाव और अर्थव्यवस्था के अपरिवर्तनीय भूमंडलीकरण के चलते राष्ट्रीय सरकारों का प्रभाव कम हो रहा है। फिर भी अपेक्षाकृत नए एवं कई देशों में सक्रिय संस्थाओं के बेहतर शासन में अंतरराष्ट्रीय संस्थान और प्रक्रियाएं न केवल पीछे रह जा रही हैं बल्कि उनकी बुनियाद पर ही सवाल उठाया जा रहा है। भूमंडलीकरण के खिलाफ विश्वव्यापी असंतोष और अतीत के जाने-पहचाने राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति एक तरह का लगाव देखा जा रहा है।
 
यह पुनराभिव्यक्ति अव्यावहारिक भी है क्योंकि सीमापार चुनौतियों के वाहक तकनीकी एवं आर्थिक अवयव हैं और अब ये हमारी जिंदगी में व्यक्तियों और समुदायों के तौर पर इस कदर घुलमिल गए हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। यह जिन्न को दोबारा बोतल में बंद करने की कोशिश जैसा है। नई सहस्राब्दी की पारिस्थितिकी, आर्थिक एवं रणनीतिक चुनौतियों को केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर के शासन से ही निपटा जा सकता है। उसके लिए अंतरराष्ट्रीयता की भावना जगाने की जरूरत है जिससे राष्ट्रवादी आग्रहों पर काबू पाया  जा सकता है। अगर राष्ट्रवादी आग्रहों पर काबू नहीं पाया गया तो वे इंसानी वजूद को ही खतरे में डाल सकते हैं।
 
वैसे अंतरराष्ट्रीयता कोई नई संकल्पना नहीं है। यह लंबे समय से अस्तित्व में रही है लेकिन इसका स्वरूप अलग रहा है। 19वीं सदी की उदारवादी अंतरराष्ट्रीयता गिने-चुने औपनिवेशिक देशों तक ही सीमित थी और उसमें उपनिवेशों और कमजोर देशों को शामिल नहीं किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आए स्वतंत्र, संप्रभु एवं राजनीतिक रूप से समान देशों के दौर में उस धारणा का कायम रह पाना संभव नहीं था। समाजवादी देशों के साथ जुड़ी क्रांतिकारी एवं अतिवादी अंतरराष्ट्रीयता भी सोवियत संघ के पतन और चीन के सरकारी पूंजीवाद एवं बाजारवादी अर्थव्यवस्थी की गिरफ्त में जाने के बाद अपनी ऊर्जा खो बैठी। शीत युद्ध के खात्मे और विकासशील देशों की एकता को एक आदर्शवादी एवं अवास्तविक संकल्पना के रूप में देखे जाने के बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी लगभग खत्म ही हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी ताकत के सहारे पनपी अंतरराष्ट्रीयता भी अब पतन की ओर है क्योंकि खुद अमेरिकी दबदबे में कमी आई है और शक्ति के कई केंद्र उभरने से वर्तमान भू-राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती मिल रही है। ऐसी स्थिति में हम एक बुनियादी दुविधा से रूबरू होते हैं: इतिहास के इस दौर में हमें अधिक सशक्त, समावेशी एवं प्रभावी अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और प्रक्रियाओं की जरूरत है ताकि एकदम नई तरह की चुनौतियों से निपटा जा सके और राष्ट्रवादी धारणा की ओर झुक रही अंतरराष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद में संतुलन साधा जा सके।
 
सवाल उठता है कि हमारे समय में किस तरह की अंतरराष्ट्रीयता प्रासंगिक होगी? हमें यह मानते हुए शुरुआत करनी चाहिए कि भूमंडलीकरण के जिन दुष्प्रभावों को हम देख रहे हैं, वे इस अविवादित सच्चाई से पैदा होते हैं कि तकनीकी प्रगति की रफ्तार मानवीय कल्पना और सामाजिक रीति-रिवाजों की ग्रहण क्षमता से अधिक तेज हो चुकी है। जाने-पहचाने चेहरों की तलाश समझी जा सकती है। फिर भी 'भूमंडलीकरण ऐसी घंटी है जिसे बजाए बगैर रहा भी नहीं जा सकता है।' अब हम ऐसी दुनिया का हिस्सा नहीं हैं जिसमें देश खुद को एक आवरण के भीतर बंद रखते हुए भी अपना वजूद बचाए रख सकते हैं और न ही विदेशी संपर्कों पर घरेलू हितों को अहमियत देने से काम चल सकता है। असल में, दूसरे देशों के साथ संपर्क अपने घरेलू लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अपरिहार्य हो चुका है क्योंकि आज अधिकांश मसले राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सीमाओं से परे होते हैं और उनका व्यापक वैश्विक आयाम भी होता है। राष्ट्रीय नियंत्रण की ललक, एक काल्पनिक ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान की तरफ लौटने की चाहत (मसलन, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और ब्रेक्सिट पर मतदान) का कुंठित अपेक्षाओं के रूप में तब्दील होना अपरिहार्य है। 
 
पश्चिमी देशों में भूमंडलीकरण को उस समय तक गले लगाया गया जब तक इसने पश्चिमी उत्थान को कायम रखा लेकिन राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति के दूसरे केंद्रों के भी वजूद में आने पर यह खतरा समझा जाने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर की तरह अमेरिका को फिर से महान बना पाना अब मुमकिन नहीं है। इसी तरह शी चिनफिंग ने चाइना ड्रीम को साकार करने का जो विचार रखा है वह भी चीनी अर्थव्यवस्था के लिए भूमंडलीकरण का तार्किक गंतव्य नहीं होने से संभव नहीं है। चाइना ड्रीम असल में अतीत के गौरव की तरफ लौटने की चाहत भर है लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक परिवेश में उसे हासिल नहीं किया जा सकता है। यह केवल एक नई तरह की अंतरराष्ट्रीयता है जो भूमंडलीकरण के लाभों को समान रूप से वितरित करने लायक बनाती है, इसके नकारात्मक असर को सीमित करती है और सभी तरह की शासन प्रणालियों के बीच तालमेल बिठाते हुए अधिक शांति एवं समृद्धिï लाने की कोशिश करती है। बहुस्तरीय संस्थान और प्रक्रियाएं अब प्रतिस्पद्र्धी राष्ट्रवादी धारणाओं की होड़ नहीं है। उसमें अंतरराष्ट्रीयता का भाव झलकना चाहिए क्योंकि इसकेबगैर बहुस्तरीयता बेमेल नतीजे देने के लिए बाध्य होगी। 
 
क्या दुनिया को इस नई अंतरराष्ट्रीयता की तरफ ले जाने और मानवता के समक्ष मौजूद चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी विश्व व्यवस्था बनाने में भारत की कोई भूमिका है? नई विश्व व्यवस्था के लिए जरूरी लक्षण युगों से भारत की संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं: दूसरों के प्रति उदार और खुद पर यकीन रखने वाली संस्कृति इसका सहज पहचान रही है, विविधता और बहुलता को आसानी से स्वीकार करने वाली आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक एकता और एक राष्ट्र के तौर पर महानता हासिल करने का पूरा यकीन होने जैसे भाव इसकी मिसाल हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीयता का कलेवर नहीं रखने वाला राष्ट्रवाद एक बंद गली की ही तरफ जाने वाला रास्ता है। 
 
(लेखक विदेश सचिव रह चुके हैं और फिलहाल सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)
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