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मोदी की आर्थिक नीतियों की राजनीतिक सीमाएं

टीसीए श्रीनिवास-राघवन |  May 14, 2018 10:21 PM IST

जब नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली तो उस समय देश के वृहद आर्थिक हालात दयनीय थे और इसका सारा 'श्रेय' पिछली सरकार के दौरान वित्त मंत्री रह चुके प्रणव मुखर्जी और पी चिदंबरम को जाता था। मोदी के सामने दो आर्थिक चुनौतियां थीं और आम तौर पर अर्थशास्त्र के तिकड़म से दूरी बरतने वाले मोदी हालात को पूरी तरह भांप चुके थे। सबसे पहली चुनौती महंगाई की थी, जिसके गंभीर राजनीतिक परिणाम होते हैं। दूसरी अहम चुनौती विदेशी मुद्रा भंडार से जुड़ी थी, जिसे लेकर भारतीय जनता पार्टी हमेशा गंभीर रही है। हालांकि, महंगाई पिछले ऊंचे स्तरों से जरूर नीचे आ गई थी, लेकिन मुश्किलें फिर भी कम नहीं हुई थीं, क्योंकि 2009 के बाद खाद्य वस्तुओं की कीमतें 65 प्रतिशत तक चढ़ चुकी थीं। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो चुका था और 1991 के गंभीर आर्थिक हालात दोबारा बनते प्रतीत हो रहे थे। 

 
तत्कालीन स्थिति से अवगत होने के बाद मोदी ने संभवत: तीन सामान्य निर्देश जारी किए थे। सबसे पहले उन्होंने वित्त मंत्रालय को किसी भी कीमत पर राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने की हिदायत थमा दी। दो अन्य निर्देश भारतीय रिजर्व बैंक को दिए गए। मोदी ने केंद्रीय बैंक को महंगाई कम करने के लिए सभी उपाय करने और भुगतान संकट से पूरी तरह बचने को कहा। 
 
मोदी से भी हुई चूक
 
वित्त मंत्रालय और आरबीआई ने निर्देशों का पालन किया और इसके अच्छे नतीजे भी दिखे। 2016 की शुरुआत तक मोटे तक पर मुश्किलों से निजात मिल चुकी थी। पहली प्राथमिकता महंगाई एवं राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने की थी। संप्रग शासनकाल में ये दोनों चीजें उफान पर थीं और तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार आंख मूंद कर तमाशा देख रही थी। लोकतंत्र में वैचारिक स्वतंत्रता होती है और आरोप-प्रत्यारोप लगते रहते हैं। मोदी सरकार पर भी कई तरह के आरोप लगाए जा सकते हैं और लगे भी हैं, लेकिन वृहद आर्थिक हालात के प्रबंधन के स्तर पर नुक्ताचीनी की गुंजाइश बिल्कुल नहीं है। उस दौरान कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, जिससे मोदी को हालात संभालने में खासी मदद मिली। इसे राजनीतिक एवं लोगों की धारणाएं बदलने के लिहाज से भी एक अच्छा प्रबंधन कहा जा सकता है, क्योंकि लोग संप्रग सरकार के दौरान 2009 से 2013 के बीच आसमान छूती महंगाई से तंग आ चुके थे।   
 
हालांकि मोदी की शुरुआती नीतियों से हालात जरूर संभले, लेकिन मौजूदा दिक्कतों की बुनियाद भी तभी पड़ गई थी। शायद मोदी वृहद आर्थिक हालात को महंगाई नियंत्रित करने और भुगतान संकट से बचने के दोहरे लक्ष्य से ही जोड़कर देखते हैं। उन्होंने 2016 में वित्त मंत्रालय और आरबीआई को जो निर्देश दिए थे, उनमें बाद में परिस्थितियों के हिसाब से संशोधन की जरूरत थी, लेकिन मोदी ऐसा नहीं कर पाए। संभवत: मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने नवंबर में 500 और 1,000 रुपये के नोट चलन से बाहर कर दिए, जिससे अर्थव्यवस्था की गति और सुस्त हो गई। वह ऐसा समय था जब अर्थव्यवस्था में थोड़ी तेजी लाने की जरूरत थी। 
 
पहले अपनाई गई नीतियों ने ऊंची ब्याज दरों और राजकोषीय घाटा नियंत्रित कर अर्थव्यवस्था की गति धीमी की, लेकिन इस बार मोदी को नोटबंदी ही एक मात्र जरिया समझ में आया। नोटबंदी के झटके से बाहर निकलने में देश की अर्थव्यवस्था ने पूरा 2017 ले लिया। हालांकि अब हालात सुधरने शुरू हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक अब इस बात पर एकमत हैं कि 2018 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 7.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। हालांकि एक सवाल अब भी मुंह बाए खड़ा है: अगर मोदी के पास आर्थिक नीतियों की राजनीतिक समझ कम होती तो क्या निवेश, कार्य और रोजगार के मोर्चे पर उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया होता? इसका जवाब पूरी तरह हां है। 
 
मुख्य अंतर
 
एक तर्क यह दिया जा सकता है कि सभी प्रधानमंत्रियों को अर्थशास्त्र की केवल राजनीतिक समझ होती है। इसमें कुछ गलत नहीं है और यह समझ होनी भी चाहिए। वास्तव में मनमोहन सिंह कई बार कह चुके थे कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वह अब अर्थशास्त्री नहीं रह गए हैं। मोदी और उनसे पहले प्रधानमंत्री पद का ओहदा संभाल चुके लोगों में एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। मोदी से पहले के प्रधानमंत्रियों ने अपनी राजनीति सूक्ष्म आर्थिक हालत से जुड़े निर्णयों तक ही रखी, लेकिन मोदी ने ठीक इसका  उल्टा किया है। 
 
उन्होंने वृहद आर्थिक हालात का एक राजनीतिक नजरिया (महंगाई नियंत्रित करने विदेशी मुद्रा विनियम एवं दर ऊंची रखना) अपनाया है, जबकि सूक्ष्म आर्थिक हालात को लेकर उनका नजरिया गैर-राजनीतिक रहा है। इसका मतलब निकाला जा सकता है कि बाजार को पहले के मुकाबले अधिक स्वतंत्रता दी गई। उन्होंने सब्सिडी पर कैंची चलाई और कर आधार का दायरा बढ़ाया। मोदी ने गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) पर भी लगाम लगाई और दूसरे महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म आर्थिक नीतिगत बदलाव किए। हालांकि, ऐसा कर उन्होंने लगभग सभी मतदाताओं का गुस्सा भी मोल लिया है। इन सूक्ष्म आर्थिक नीतियों के परिणाम कुछ समय बाद दिखेंगे, लेकिन वृहद आर्र्थिक स्तर (कम राजकोषीय घाटा, ऊंची ब्याज दरें और रुपये की मौजूदा हालत) पर उन्होंने जो स्थितियां पैदा की हैं, उनका तात्कालिक असर निवेश पर दिख रहा है। जाहिर हैं, इनसे रोजगार सृजन के अवसर भी कम हुए हैं। 
 
वृहद आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन में मौके की नजाकत समझनी होती है और इनके लिए सही समय नहीं चुनकर मोदी ने कम से कम 50 लोकसभा सीटें हाथ से निकलने का जोखिम मोल ले लिया है। इनके अलावा 50-60 सीटें तो भाजपा के हाथ से वैसे भी निकल जातीं। 
कीवर्ड narendra modi, BJP, economy,

  
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