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शेयरों के दान पर लटक रही कर की तलवार

श्यामल मजूमदार |  May 15, 2018 10:00 PM IST

क्या भारतीय कंपनियां लोक कल्याण एवं परोपकार से जुड़े कार्यों के लिए पर्याप्त कदम उठा रही हैं? इस सवाल के जवाब में भिन्नता हो सकती है। सरकार का कहना है कि जब से उसने कंपनियों के लिए उनके मुनाफे का 2 प्रतिशत हिस्सा निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर व्यय करना अनिवार्य किया है, तब से इस उद्देश्य के लिए धन का प्रवाह बढ़ा है। हालांकि जो रकम आई है, वह वास्तव में बहुत अधिक नहीं है। कंपनी मामलों के मंत्रालय के अनुसार सीएसआर पर 5,000 कंपनियों का व्यय 2015-16 में महज 98.22 अरब रुपये था। 

 
'इंडिया फिलैनथ्रपी रिपोर्ट' 2017 में बेन ऐंड कंपनी ने कुछ दिलचस्प आंकड़े दिए हैं। सापेक्षिक स्तर पर विकास क्षेत्र के लिए जुटाई गई रकम में निगमित परोपकार में कंपनियों की हिस्सेदारी वास्तव में कम हुई  है। 2016 में निजी परोपकार में कंपनियों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत रही, जो 2011 में 30 प्रतिशत हुआ करती थी। हालांकि अच्छी खबर भी है। पिछले पांच साल में विकास क्षेत्र के लिए कुल रकम में 9 प्रतिशत वृद्धि हुई है और यह 1,500 अरब रुपये से बढ़कर 2,200 अरब रुपये हो गई है। वैसे सरकार का योगदान सबसे अधिक रहा है (2016 में 1,500 अरब रुपये), लेकिन कुल रकम में इसकी हिस्सेदारी लगातार कम पड़ रही है।
 
पांच साल के दौरान संग्रहीत 700 अरब रुपये में मुख्य रूप से निजी योगदान रहा है। 2016 में विकास क्षेत्र के लिए आई कुल रकम में निजी दान का हिस्सा एक तिहाई रहा। 2011 में इनका हिस्सा महज 15 प्रतिशत था। उत्साहित करने वाली बात यह है कि व्यक्तिगत स्तर से परोपकार कार्यों के लिए आने वाली रकम में हाल के सालों में छह गुना तेजी आई है। हालांकि वास्तविक संख्या अब भी क्षमता से कहीं कम है। भारत में बड़े स्तर पर दान दिए जाने या परोपकार कार्य किए जाने की जरूरत है। अमेरिका में परोपकार के लिए आने वाली रकम वहां के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2 प्रतिशत है। भारत में यह खासी कम है।
 
इसे बढ़ाने का एक तरीका शेयर का कर-मुक्त दान हो सकता है। भारत में जहां-तहां उद्यमी अपनी कंपनियों में शेयर (इक्विटी) के रूप में अपने धन का एक बड़ा हिस्सा रखते हैं। हालांकि इस माध्यम से दान देने में एक बड़ी समस्या है। इसकी वजह यह है कि 1973 तक भारत ने कल्याण कार्यों के उद्देश्य से शेयर दान दिए जाने की अनुमति दी थी और जो संस्थान ये शेयर लेते थे, उनका कर-मुक्त दर्जा भी बरकरार रहता था। यह प्रावधान तत्काल वापस ले लिया गया, शायद इसलिए क्योंकि इसमें पारदर्शिता और विश्वास की कमी नजर आने लगी। इसमें हैरान होने वाली कोई बात नहीं थी, क्योंकि यह ऐसा समय था, जब सरकार ने एमआरटीपी अधिनियम शुरू  किया था। इसके बाद विदेशी विनिमय नियमन कानून भी अस्तित्व में आ गया। 
 
यह समय ऐसा है जब सरकार को एक बार फिर कल्याणकारी उद्देश्यों से शेयर दान देने की व्यवस्था शुरू करनी चाहिए और इन्हें प्राप्त करने वाले संस्थानों का आय कर से छूट का दर्जा भी समाप्त नहीं होना चाहिए। कल्याणकारी न्यास/कंपनियां अगर उनके द्वारा अधिग्रहीत कंपनियों (उन्हें छोड़कर जो तय श्रेणी में शामिल हैं) में हिस्सेदारी रखते हैं, जिनका अधिग्रहण 1 जून, 1973 या उसके बाद हुआ है और अधिग्रहण वर्ष के अगले साल 31 मार्च तक इनकी बिक्री नहीं हुई है तो वे आयकर अधिनियम की धारा 11 और 12 के तहत आय कर से छूट का दर्जा खो देंगी। यह अधिग्रहण किसी भी रूप में क्यों नहीं हुआ हो (चाहे शेयर संस्थान के लिए दान में दिए गए हैं या संस्थान द्वारा खरीदे गए हैं), सबके साथ यही बात लागू होती है।
 
इसमें बदलाव की जरूरत है। जैसा कि तेलुगू देशम पार्टी के संसद सदस्य केसिनेनी श्रीनिवास कहते हैं कि दुनिया में यह चलन आम है, जिसमें धनाढ्य लोग कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा कल्याणकारी संस्थानों को दान दे देते हैं। हालांकि भारत में कर देनदारी के झंझट के कारण कई उद्यमी और धनाढ्य निवेशक इस रास्ते से बचना चाहते हैं। यह अफसोस वाली बात है, क्योंकि भारत में इस माध्यम से दान आने की खासी संभावनाएं हैं। फोब्र्स 2017 में 100 भारतीय अरबपतियों की सूची के अनुसार इन लोगों की कुल शुद्ध हैसियत करीब 250 अरब डॉलर है। इनमें ज्यादातर रकम कंपनियों में शेयर के रूप में हैं और अगर इनका 1 प्रतिशत हिस्सा भी दान के उद्देश्य से दिया जाए तो यह रकम बहुत बड़ी होगी। जायदाद कर, संपत्ति कर, व्यक्तिगत आय पर कर चोरी रोकने के लिए 1973 में पाबंदी लगाई गई थी, लेकिन अब किसी भी दृष्टिïकोण से ये वाजिब नहीं ठहरते हैं। 
 
यह बात ध्यान में रखनी होगी कि अगर न्यास आय अर्जित करने वाली प्रतिभूतियों जैसे बॉन्ड में निवेश करते हैं तो कालांतर में महंगाई आदि के कारण इनके वास्तविक मूल्य का ह्रïास होगा। इससे लोक कल्याण कार्य बरकरार रखना या इनका विस्तार करना मुश्किल हो जाएगा। कुल मिलाकर यह साबित हो चुका है कि दीर्घकाल में शेयर बॉन्ड या फिक्स्ड डिपॉजिट से अधिक प्रतिफल देते हैं। यह करने की जरूरत नहीं कि इस प्रावधान का बेजा इस्तेमाल रोकने के लिए पर्याप्त उपाय किए जाने की जरूरत है। उदाहरण के लिए कल्याणकारी संस्थाओं को पूंजी बाजारों में अपने फंडों में निवेश करने या उन्हें कयास वाले लेन-देन में हिस्सा लेने से रोका जाना चाहिए। इतना ही नहीं, किसी न्यास को तभी कल्याणकारी माना चाहिए जब इसका उद्देश्य समुदाय के लाभ के लिए है, न कि किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के लिए। 
 
पुराने प्रावधान दोबारा लागू करने के पीछे वाजिब वजह है। सरकार ने कर मुक्त कल्याणकारी न्यासों को नए न्यासों के लिए कंपनियों में हिस्सेदारी रखने से मना कर दिया था, लेकिन टाटा एवं बिड़ला जैसे पुराने न्यासों को इससे रियायत दे दी थी। यह वाकई भेदभावपूर्ण व्यवहार है, जो खत्म होना चाहिए। 
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