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एकता में शक्ति

संपादकीय |  May 15, 2018 09:59 PM IST

आखिरकार एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सबसे मारक हथियार साबित हुए। एकदम अंतिम समय में की गई उनकी तूफानी रैलियों ने सुर्खियां भी बटोरीं और लोगों का ध्यान भी आकृष्ट किया। इन सबकी बदौलत कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने के करीब जा पहुंची। अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को बूथ स्तर की राजनीति में महारत हासिल है। वहीं मोदी का मतदाताओं के साथ अलग ही तरह का रिश्ता है। इन दोनों की बदौलत भाजपा देश में सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति बनी हुई है। 

 
बहरहाल इन दोनों कारकों की मौजूदगी और कर्नाटक के मतदाताओं के मन में एक हद तक सत्ताविरोधी रुझान के बावजूद भाजपा पूर्ण बहुमत हासिल करने में नाकाम रही। इसका पूरा श्रेय कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्घरमैया को दिया जाना चाहिए जिन्होंने जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया।  हालांकि कांग्रेस प्रदेश में सत्ता में थी और उस लिहाज से देखा जाए तो कांग्रेस का प्रदर्शन भले ही वैसा नहीं रहा हो जैसी कि उसने अपेक्षा की होगी लेकिन फिर भी उसे इस बात से थोड़ी राहत मिल सकती है कि उसका मत प्रतिशत भाजपा से बेहतर रहा। सच यह भी है कि भाजपा हमेशा से अपने वोटों को सीट में बदलने के मामले में प्रभावशाली रही है क्योंकि उसके मतदाता कहीं अधिक केंद्रित हैं। इतना ही नहीं वर्ष 2013 के पिछले चुनाव के उलट कांग्रेस के सामने इस बार एकजुट भाजपा थी। उस वक्त राज्य भाजपा कई धड़ों में बंटी हुई थी। एक धड़े का नेतृत्व बीएस येदियुरप्पा कर रहे थे। तमाम बंटे हुए धड़े अब एकसाथ हैं और इसलिए कांग्रेस का काम और मुश्किल हो गया। 
 
कर्नाटक की नई सरकार को चुनावी राजनीति की चिंताओं को पीछे छोडऩा होगा। राज्य में काफी कुछ किया जाना है। उसके मतदाता बेहतर प्रदर्शन न करने वाली सरकार को दंडित भी करते हैं। कर्नाटक आमतौर पर समृद्घ नजर आता है लेकिन वहां भी तमाम ऐसी जगह हैं जहां ग्रामीण क्षेत्रों में गहरी निराशा व्याप्त है। पानी की कमी और कृषि की खराब बुनियादी व्यवस्था ने किसानों की दिक्कत और बढ़ाई है। कर्नाटक की पिछली सरकार समेत अतीत में इससे निपटने के जो तरीके अपनाए गए वे स्थायी नहीं थे। 
 
कर्ज माफी और चुनाव अभियान के दौरान किए गए वादे ग्रामीण हताशा के वास्तविक कारणों को हल नहीं कर पाते। तेज वृद्घि और रोजगार के ज्यादा अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है। इनकी मदद से ही ग्रामीण आबादी पर से दबाव कम किया जा सकता है। इस बीच बेंगलूरु जो बीते दशकों में तेजी से विकसित हुआ और देश के सूचना प्रौद्योगिकी जगत का मुख्यालय बना वह भी बढ़ते दबाव की चपेट में है। उसे मूलभूत सुविधाओं के लिए काफी निवेश चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की वृद्घि में गिरावट भी जल्दी ही इसे परेशान करेगी। नई सरकार को इससे भी निपटना होगा। उसे राज्य के विभिन्न हिस्सों में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव से भी निजात पानी होगी। 
 
कर्नाटक चुनाव के राष्ट्रीय राजनीति पर पडऩे वाले प्रभाव एकदम स्पष्टï हैं। अगर विपक्ष एकजुट नहीं हुआ तो वह न केवल हारेगा बल्कि साफ हो जाएगा। कांग्रेस ने नतीजे साफ होने के बाद जिस तेजी के साथ जनता दल सेक्युलर से संपर्क किया वह दिखाता है कि उसने अतीत से सबक लिया है जब उसे गठबंधन में देरी के चलते सत्ता से वंचित रहना पड़ा। मोदी और उनकी पार्टी को इससे यह प्रोत्साहन मिल सकता है कि वे चुनावों में अकेले उतरें लेकिन विपक्ष को इसका एकदम उलटा करना होगा। 
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