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सूरत के कपड़े पर अब लागत का संकट

राजेश भयानी | मुंबई May 15, 2018 10:01 PM IST

सूरत के कपड़ा बुनकर और प्रसंस्करणकर्ता डेढ़ साल में तीसरी बार संकट की स्थिति में चले गए हैं। नवंबर 2016 में उच्च मूल्य के करेंसी नोट वापस ले लिए गए थे। इससे सूरत पंगु हो गया था, क्योंकि इसकी अर्थव्यवस्था बड़े स्तर पर नकदी पर आधारित थी, जिसमें छोटे प्रसंस्करणकर्ता और प्रवासी कर्मचारी भी शामिल थे। पिछले वर्ष जुलाई में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लगाए जाने के बाद लंबे समय तक उद्योग को बंद कर दिया गया था। इससेे बड़ा झटका लगा, क्योंकि इसके अनुपालन बोझ के साथ-साथ कपड़ा प्रसंस्करणकर्ताओं की लागत काफी बढ़ गई थी। यही काफी नहीं था कि पिछले एक महीने में पॉलिएस्टर धागे की कीमतें 6-8 प्रतिशत तथा तीन महीने में 12-15 प्रतिशत के बीच बढ़ गईं। अन्य लागत के साथ-साथ, जनवरी से कुल लागत में 30 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ है। यह ऐसे समय में हो रहा है कि जब कपड़े की मांग कम है। मांग में नई जान कुछ महीने बाद तभी आएगी, जब त्योहारी सीजन शुरू होगा। गुजराती कैलेंडर में अधिमास के कारण त्योहार एक महीने की देरी से शुरू होंगे।
 
हाल ही में सूरत की सभी पावरलूम सहकारी समितियों और लाखों करघों और कर्मचारियों से जुड़े ठेके पर काम करने वालों की एक बैठक हुई, जिसमें उन्होंने परिचालन की दैनिक पालियों को तीन से घटाकर दो करने का प्रस्ताव दिया था। कई कर्मचारी अवकाश पर भी जा रहे हैं। पालियों की संख्या में कमी करने का मतलब है उत्पादन में कमी। एक अग्रणी संयुक्त मिल के कार्यकारी ने कहा कि जीएसटी के बाद सूरत के कृत्रिम कपड़ा उत्पादन मेंएक-तिहाई गिरावट आई है। इन उद्योग संघों/सहकारी समितियों ने छह या आठ घंटे की दो पालियों में काम करने का फैसला किया है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन में एक-तिहाई कटौती हुई है।
 
पंडेसरा वीवर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी लि. के अध्यक्ष आशीष गुजराती ने कहा कि जीएसटी लागू किए जाने के बाद से सूरत कपड़ा उद्योग अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है। कपड़ा उत्पादन में बड़ी गिरावट देखी गई है। अब धागे की बढ़ती कीमतों ने उत्पादन में कटौती करने केलिए हमें उन पालियों की संख्या में कमी करने को विवश किया है जिनमें हम लागत बचाने के लिए काम कर रहे थे। अधिकांश बुनकरों की सहकारी समितियों और ठेके पर काम करने वालों ने मिलकर एक पाली कम करने का फैसला किया है। यदि धागे की बुनाई नहीं होती है और कपड़े का उत्पादन नहीं किया जाता है, तो ठेका कर्मियों के पास भी अधिक प्रसंस्करण कार्य नहीं होगा।
 
शाहलॉन समूह के प्रबंध निदेशक धीरज शाह बताते हैं कि पिछले कई महीनों से कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसके परिणामस्वरूप डीएमटी, पीटीए, एमईजी आदि जैसे पेट्रो रसायनों की कीमतें भी बढ़ रही हैं। यह सूरत स्थित पावरलूम द्वारा बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने वाले पॉलिएस्टर धागे काउत्पादन करने का कच्चा माल है। इसी वजह से, ऐसे समय में कि जब मंद मांग का सीजन शुरू हो चुका है, तब बुनकरों ने उत्पादन में कटौती करने का फैसला किया है। पावरलूम की एक और समस्या है। हालिया बैठक में लिए गए एक निर्णय के अनुसार इसके संबंध में वित्त मंत्रालय को अवगत कराया जाएगा। कृत्रिम कपड़े पर पांच प्रतिशत जीएसटी लगता है, लेकिन धागे पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगता है। इसका मतलब यह है कि कपड़ा बेचते समय वे धागे के लिए किए गए भुगतान पर पूरे जीएसटी का दावा नहीं कर सकेंगे।
कीवर्ड surat, textiles, कपड़ा एवं परिधान नीति,

  
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