राम के चमत्कार से बढ़ी गन्ना पैदावार

संजीव मुखर्जी |  May 15, 2018 10:03 PM IST

कृषि विज्ञान में स्वर्ण पदक विजेता डॉ. बख्शी राम ने गन्ने पर अनुसंधान किया है
मात्र एक दशक में उन्होंने कम से कम 14 गन्ना किस्मों की शुरुआत की
इनमें से सीओ-0238 किसानों और मिलों के बीच हुई सबसे अधिक लोकप्रिय

चीनी उत्पादन 3.1 करोड़ टन का स्तर छूने से जहां एक ओर भारत के चीनी क्षेत्र की निगाहें अभूतपूर्व प्रचुरता पर लगी हुई हैं, वहीं दूसरी ओर चीनी का स्वाद अचानक कड़वा होने लगा है। कारण यह है कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य उत्तर प्रदेश में मिलों को गन्ना किसानों का भुगतान करना मुश्किल लग रहा है। चीनी की इस अधिकता के केंद्र में गन्ने की सीओ-0238 नामक एक नई किस्म है।

अब (2017-18 फसल वर्ष में) इसका उत्तरी भारत में 50 प्रतिशत से अधिक गन्ना क्षेत्र पर कब्जा है, जबकि 2012-13 में जब पहली बार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इसकी अनुशंसा की गई थी, तब यह रकबा केवल तीन प्रतिशत था। इस आश्चर्यजनक प्रजाति के पीछे डॉ. बख्शी राम का हाथ है, लेकिन वह इतने से संतुष्ट नहीं हैं। वर्तमान में डॉ. बख्शी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कोयंबत्तूर में गन्ना प्रजनन केंद्र के निदेशक हैं। उनका अगला लक्ष्य विंध्य क्षेत्र से आगे - दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी उगाई जाने वाली गन्ना किस्मों में शर्करा और पैदावार में सुधार करना है।

डॉ. बख्शी ने कहा, 'उत्तर भारत में गन्ना किसानों के साथ किए गए मेरे काम से दक्षिण की मिलों में नई किस्में अपनाने के लिए उन्हें राजी करने में आसानी हुई। मुझे विश्वास है कि अगले तीन सालों में दक्षिण भारत में भी सुधार आएगा, खासकर तमिलनाडु में।' बख्शी राम कोई साधारण वनस्पति प्रजनक नहीं है। मात्र एक दशक में, उन्होंने कम से कम 14 गन्ना किस्मों की शुरुआत की है।

इनमें से अधिकांश उत्तर भारत के अनुकूल हैं और कुछ तो बेहद सफल रही हैं, जबकि अन्य किस्मों में किसानों के बीच औसत दर्जे की सफलता और स्वीकार्यता दिखी है। इनमें से सीओ-0238 किसानों और मिलों के बीच सबसे अधिक लोकप्रिय हुई है। सीओ-0238 मौजूदा गन्ने की किस्मों के मुकाबले न केवल प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन करती हैं, बल्कि इसमें शर्करा भी अधिक होती है। इस तरह, जहां अधिक उपज से किसानों को लाभ होता है, वहीं अधिक शर्करा मिलों का दिल खुश कर देती है।

कृषि विज्ञान में स्वर्ण पदक विजेता डॉ. बख्शी राम को गन्ना अनुसंधान स्वाभाविक रूप से नहीं मिला है। वह कहते हैं कि 1986 में जब वह पहली बार कोयंबत्तूर में गन्ना प्रजनन संस्थान से जुड़े, तो उन्हें गन्ने पर एक शब्द भी मुश्किल से ही पता था। लेकिन डॉ. बख्शी राम छह महीने तक संस्थान के समृद्ध पुस्तकालय में बैठे और इस फसल के संबंध में लगभग सब कुछ पढ़ डाला।

उनके इस ज्ञान के खजाने ने उन्हें दो बुनियादी सिद्धांतों अथवा इस फसल के संदर्भ में स्थापित तथ्यों को समझने में मदद की। पहला यह था कि उप-उष्णकटिबंधीय भारत (जिसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा समेत उत्तरी भारत का बड़ा भाग शामिल रहता है) में उगाए जाने वाला गन्ना उष्णकटिबंधीय भारत में उगाए जाने वाले गन्ने की तुलना में पतला होता है। दूसरा, शर्करा की मात्रा का गन्ना उत्पादन से विपरीत अनुपात रहता है।

इसका मतलब यह था कि जहां उत्तर भारत में उगाया गया गन्ना अधिकतम 2-2.5 सेंटीमीटर मोटा था, वहीं अन्य भागों में उगा हुआ गन्ना 2.5-3 सेंटीमीटर मोटा था। डॉ. बख्शी राम इससे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इसे बदलने और मजबूती से स्थापित हो चुके इस सह-संबंध को तोडऩे की ठान ली। उन्होंने 1986 से शुरू करते हुए 21 साल तक (बीच में उच्च अध्ययन के लिए सात साल केअंतराल को छोड़कर) कोयंबत्तूर और करनाल (गन्ना प्रजनन के क्षेत्रीय केंद्र) दोनों में ही गन्ने की किस्मों पर काम किया।

उन्होंने ऐसी किस्मों काविकास करने का प्रयास किया जिन्होंने परंपरागत रूप से स्थापित हो चुकी गन्ना किस्मों को चुनौती दी। राष्ट्रीय स्तर पर गन्ने कि किस्म की पहचान, विकास और जारी करने में 12-13 साल लगते हैं। राम ने कहा कि मैंने 2007 में अपनी पहली गन्ना किस्म को-98014 जारी की और उसके बाद कई और, लेकिन यह सीओ-0238 ही थी जिसे किसानों द्वारा सबसे ज्यादा पसंद किया गया और जिसकी सबसे अधिक खेती की गई।

सीओ-0238 का पहली बार उत्तर प्रदेश में डीएससीएल अजबपुर और सिंभावली की गन्ना मिलों में परीक्षण किया गया था। हालांकि, डीएससीएल ने इसे जल्द ही छोड़ दिया, लेकिन सिंभावली ने इस किस्म में रुचि दिखाना जारी रखा और अपने किसानों को गन्ने की खेती के लिए राजी किया। बाद में इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) भी शामिल हो गई और बिहार, हरियाणा, उत्तराखंड तथा उत्तर प्रदेश में फैली 22 मिलों में खेती परीक्षण का संचालन किया, जिससे यह किस्म अपनाने के लिए चीनी मिलों में विश्वास जगा।

डॉ बख्शी राम ने कहा कि विभिन्न स्थानों पर हुए इन खेती परीक्षणों से यह प्रजाति उत्तर प्रदेश की सीमाएं पार कर सकी और राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श का विषय बन गई। अन्यथा, यह राज्य तक ही सीमित रह गई होती। 2012 में जब उत्तर प्रदेश सरकार ने को-0238 की अनुशंसा करनी शुरू की, तब किसानों के बीच इसकी स्वीकार्यता बढ़ गई। 2012-13 में राज्य के संपूर्ण गन्ना क्षेत्र के तीन प्रतिशत पर इस प्रजाति का कब्जा था।

अब इस प्रजाति का विस्तार 52 प्रतिशत क्षेत्र पर है। राम ने कहा कि कई सालों तक वह समय पर कार्यालय से नहीं निकले और यहां तक कि रविवार को भी गन्ना किस्मों को समय देने के लिए काम किया, इतना अधिक कि उनके बच्चे गन्ने को उनकी पहली पत्नी कहते हैं। इस सबका परिणाम सामने आ रहा है। चूंकि डॉ. बख्शी राम अगले तीन सालों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं, इसलिए वह सेवानिवृत्ति के बाद की जिंदगी को लेकर दुविधा में हैं, लेकिन वह गन्ने पर अपना काम जारी रखना पसंद करेंगे। राम कहते हैं, 'मैं उत्तर भारत के किसान परिवार से हूं और कड़ा श्रम मुझे स्वाभाविक रूप से मिला है।'

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