भारतीय विज्ञान संस्थान की विदेश में क्यों नहीं पहचान?

समरीन अहमद और साहिल मक्कड़ |  May 15, 2018 10:04 PM IST

टाइम्स हायर एजुकेशन द्वारा 42 उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के विश्वविद्यालयों के लिए बुधवार को जारी रैंकिंग में भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) को 13वां स्थान मिला। पिछले महीने भारत सरकार द्वारा जारी भारतीय विश्वविद्यालयों की सूची में आईआईएससी पहले स्थान पर था। शिक्षाविद इस दो तरह के परिणामों को लेकर दुविधा में हैं कि आईआईएससी टाइम्स के शीर्ष 250 संस्थानों में अपना स्थान क्यों नहीं बना पाता? क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2018 में भी यह 190वें स्थान पर रहा था। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि संस्थान से कोई नोबेल पुरस्कार विजेता नहीं निकला और विदेश में वैज्ञानिकों तथा शिक्षाविदों के बीच किसी संस्थान की प्रतिष्ठा के लिए यह एक बड़ा कारण होता है। हालांकि वर्ष 1909 में जब जमशेदजी टाटा और मैसूर के महाराजा की सहायता से बेंगलूरु में इसकी स्थापना की गई तो नोबेल विजेता सी.वी. रमन को इसका पहला निदेशक बनाया गया। 

 
पिछली एक शताब्दी में संस्थान की प्रतिष्ठा काफी तेजी से बढ़ी है और ट्रैफिक जाम तथा स्टार्टअप इंडस्ट्री के अलावा अब बेंगलूरु को आईआईएससी के कारण भी जाना जाता है। जब कारों की तिरछी लाइनें और तेज हॉर्न की जगह साइकिल, पेड़ और क्रिकेट की आवाजें लेने लगें तो समझ लीजिए कि आप आईआईएससी कैंपस में आ गए हैं।  संस्थान अध्यापकों के कार्यकाल के लिए जटिल अमेरिकी मॉडल अपनाता है। अध्यापकों को पहले छह वर्ष के लिए संविदा पर रखा जाता है। छह वर्ष पूरा करने के बाद संस्थान एक प्रक्रिया के तहत अध्यापक के कार्यों की समीक्षा करता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) के वरिष्ठजनों के पैनल द्वारा साक्षात्कार समेत अन्य प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद संबंधित अध्यापक की स्थायी नियुक्ति तथा पदोन्नति होती है। 
 
आईआईएससी के एक प्राध्यापक ने कहा, 'यह जटिल प्रक्रिया अध्यापकों की क्षमता को निखारती है।' संस्थान में अध्यापक-छात्र अनुपात 1:8 का है, जो विश्व में काफी अच्छा है। टाइम्स रैंकिंग के अनुसार आईआईएससी में छात्र-अध्यापक अनुपात 8.4 है, जबकि विश्व की शीर्ष यूनिवर्सिटी ऑक्सफर्ड में भी यह 11.2 है। यहां तक कि कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में भी यह 10.9 है। इसके बावजूद, विश्व स्तरीय वैज्ञानिक और भारतीय अर्थव्यवस्था के वाहक इंजीनियर बनाने वाला आईआईएससी विश्व के शीर्ष संस्थानों में शामिल क्यों नहीं हो पाता? आईआईएससी के एक प्राध्यापक ने नाम ना छापने की शर्त पर कहा, 'इस तरह की रैंकिंग में विश्व के कुछ संस्थानों का दबदबा रहता है और यह ढांचा काफी पक्षपातपूर्ण होता है।'
 
आईआईएससी के अध्यापकों का मानना है कि रैंकिंग के मामलों में एक तरह का समूह पहले से बना होता है। भारतीय संस्थानों में किए जाने वाले शोध कार्यों को विदेशी जर्नल अधिक स्थान नहीं देते हैं और इससे रैंकिंग पर असर पड़ता है। प्राध्यापक ने कहा, 'कई बार विकसित देशों के संपादकों द्वारा हमारे काम को महत्त्व नहीं दिया जाता।' समस्या यह है कि आईआईएससी द्वारा किया जाने वाला अधिकतर काम भारत जैसे विकासशील देशों के संदर्भ को ध्यान में रख कर किया जाता है। आईआईएससी के एक संकाय सदस्य ने कहा, 'संदर्भ में अंतर होने के कारण हमारे काम को बड़े जर्नल में स्थान नहीं मिल पाता। हो सकता है कि हमारे लिए जो महत्त्वपूर्ण है वह उनके लिए महत्त्वपूर्ण ना हो, या फिर उनके लिए जरूरी संदर्भ हमारे लिए महत्त्वपूर्ण ना हो।'
 
शोधार्थियों का कहना है कि अगर सरकार संस्थान को शीर्ष पर देखना चाहती है तो उसे अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर जैसे देशों की तरह हमें भी पूरी स्वतंत्रता और आर्थिक सहायता देनी होगी। एक शोधार्थी ने कहा, 'इस तरह हम बेहतरीन क्षमता को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं।' वैश्विक रैंकिंग के लिए संस्थान में पढऩे वाले अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की संख्या को काफी महत्त्व दिया जाता है, जबकि इस बारे में भारतीय विश्वविद्यालयों की राय थोड़ी अलग है। आईआईएससी अध्यापकों का मानना है कि विदेशी संस्थानों द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रमों के लिए भारत में अच्छा बाजार नहीं है। केवल आगे बढऩे के मकसद से कुछ विदेशी विद्यार्थियों का होना जरूरी है। हालांकि चीन और भारत जैसे देशों में घरेलू मांग काफी अधिक है और इसे पूरा करने के कारण संस्थानों को नुकसान उठाना पड़ता है। आईआईएससी एल्युमिनी एसोसिएशन प्रमुख एम.पी. रवींद्र बताते हैं कि जबसे आईआईएससी ने वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर अपने खुद के मानक बनाने शुरू किए हैं, तबसे इसकी वैश्विक रैंकिंग में गिरावट आई है। 
 
आईआईटी दिल्ली के पूर्व निदेशक और भारतीय राष्ट्रीय संस्थान रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) पर काम करने वाले सुरेंद्र प्रसाद कहते हैं कि भारतीय विश्वविद्यालयों से रैंकिंग संबंधी आंकड़े 3 वर्ष पहले लेना शुरू किए थे। उन्होंने कहा, 'दूसरे मानकों के अलावा, विश्व स्तर पर संस्थान की रैंकिंग के लिए आम धारणा भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।' ब्रांड विशेषज्ञों का कहना है कि शीर्ष 100 संस्थानों में आने के लिए आईआईएससी और आईआईटी को विश्व स्तर पर अपना ब्रांड बाजार स्थापित करने की आवश्यकता है। ब्रांड सलाहकार हरीश बिजूर कहते हैं, 'आईआईएससी भारत में एक अच्छा ब्रांड बनकर उभरा है लेकिन वैश्विक माहौल में काफी प्रतिस्पर्धा है। ऐसे कई ओवरसीज संगठन हैं जो जर्नल में प्रकाशन से लेकर दूसरे काम की लोकप्रियता बढ़ाने तक हर छोटा छोटा काम के लिए 24 घंटे जनसंपर्क अभियान चलाते हैं।'
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