मोदी सरकार सधे कदमों से बढ़ी मगर कई मोर्चों पर चूकी

बीएस संवाददाता |  May 16, 2018 09:58 PM IST

क्या रहीं उपलब्धियां 

 
राजनीतिक रूप से मोदी की सबसे अहम आर्थिक उपलब्धि 2014 से महंगाई को नियंत्रित रखना होगी। इस मामले में उनकी सरकार को तेल की कीमतों में गिरावट से मदद मिली है। तेल की कीमतों में कमी से सभी चीजों के दाम कम हुए हैं। लेकिन सरकार किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने को लेकर भी सतर्क रही है, जिससे खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिली है। इस सरकार की सबसे ताजा आर्थिक उपलब्धि निश्चित रूप से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू करना है, जिसमें देश में पूरे अप्रत्यक्ष कर ढांचे में व्यापक बदलाव किए गए हैं। इसके लिए राजनीतिक सहमति और संवैधानिक संशोधन की जरूरत थी। हालांकि इसे लागू करते समय दिक्कतें आईं और यह कर उतना आसान नहीं रहा, जितनी योजना बनाई गई थी। हालांकि बहुत से लोगों को उम्मीद है कि जीएसटी परिषद आने वाले समय में कर को स्थायित्व देगी और और कर-जीडीपी अनुपात को बढ़ाएगी। 
 
कल्याणकारी आर्थिक योजनाओं में सुधार के लिहाज से मोदी सरकार ने 'जाम' यानी जन धन, आधार और मोबाइल संपर्क का इस्तेमाल कर हस्तांतरण को ज्यादा बेहतर बनाने पर ध्यान दिया है। जन धन योजना के तहत बुनियादी बैंक खातों की संख्या में भारी इजाफा हुुआ है। इसी तरह आधार का दायरा भी फैला है। हालांकि आधार को लेकर कानूनी चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण का खाका स्थापित हो गया है। 
मोदी सरकार अपने सड़क निर्माण के रिकॉर्ड और उदय योजना का भी जिक्र करेगी। उदय योजना में बिजली कंपनियों का ऋण राज्य सरकारों के खातों में हस्तांतरित कर दिया गया है, जिससे वे फिर से बिजली की खरीद और आपूर्ति कर सकेंगी। लेकिन इससे भी ज्यादा प्रभावी ऋण शोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) है, जो पूंजी के ज्यादा लचीलेपन के लिए एक बड़ा कदम है। 
 
क्या रहीं नाकामियां 
 
हालांकि मोदी की सबसे बड़ी आर्थिक नीति उनका 8 नवंबर, 2016 का वह फैसला है, जिसमें बड़े नोटों को अचानक चलन से बाहर कर दिया गया। नोटबंदी एक बड़ा नीतिगत फैसला था। राजनेताओं ने कहा कि यह काले धन पर हमला है। हालांकि ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इसके लागत के मुकाबले मामूली फायदे मिले हैं। यह साबित हो गया है कि जितनी नकदी चलन से बाहर की गई थी, उसमें से ज्यादातर बैंकों में वापस आ गई है। बहुत से लोगों ने यह उम्मीद जताई थी कि नोटबंदी की वजह से डिजिटल भुगतान का चलन बढ़ेगा, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि नकदी का इस्तेमाल नोटबंदी से पहले के स्तर पर लौट रहा है। हालांकि नोटबंदी राजनीतिक रूप से सफल रही है, लेकिन आर्थिक नीति के लिहाज से नोटबंदी अपने विभिन्न मकसद हासिल नहीं कर पाई। 
 
मोदी ने प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में सरकार को सबसे पहला बड़ा नीतिगत निर्देश विनिर्माण में बढ़ावे का दिया था। मोदी सरकार के शुरुआती वर्षों में 'मेक इन इंडिया' मुख्य नारा बन गया, लेकिन चार साल बीतने के बाद भी सरकार के पास इस मोर्चे पर दिखाने के लिए बहुत कम है। दरअसल, भारत को कारोबारी गतिविधियों में भारी गिरावट और निजी निवेश के संकट से गुजरना पड़ा, जिससे वृद्धि में सुधार के प्रयास असफल हो गए। निजी निवेश में कमी की वजह सरकारी बैंकों में एनपीए के संकट की अनदेखी थी। आईबीसी लागू करने का मतलब है कि अब उन संपत्तियों को उबारने की ढांचागत प्रक्रिया बन गई है, जो दोहरी बैलेंस शीट की समस्या में उलझ गई हैं। दोहरी बैलेंस शीट की समस्या का मतलब बैंकों और कंपनियों दोनों की बैलेंस शीट पर दबाव से है। हालांकि अभी आईसीबी नई है। अभी यह इस समस्या का समाधान नहीं हुआ है कि सरकारी बैंकों को लेकर क्या नीति अपनाई जानी चाहिए। नई पूंजी डालने, इंद्रधनुष और बैंक बोर्ड ब्यूरो जैसे आधे-अधूरे प्रयासों से इस क्षेत्र में भरोसा बहाल नहीं हुआ है। 
 
हालांकि राजनीतिक रूप से मोदी अपनी सरकार के रोजगार सृजन के रिकॉर्ड को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित होंगे। असल में कितने रोजगार अवसरों का सृजन हुआ है, इसे लेकर पिछले साल काफी मतभेद रहे हैं। हालांकि मेक इन इंडिया के तहत रोजगार के प्रावधानों से ध्यान हटाकर छोटे ऋणों की मुद्रा योजना के तहत उद्यमिता को बढ़ावा देने पर ध्यान देना अपने आप में कहानी को बयां करता है। बहुत से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब तक भूमि और श्रम कानूनों में ढांचागत सुधारों को अंजाम नहीं दिया जाता, तब तक भारत रोजगार सृजन और वृद्धि के लिहाज से कमजोर प्रदर्शन करता रहेगा। 
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