दवाएं 28 फीसदी तक महंगी होने से बढ़ी मुश्किलें

बीएस संवाददाता | वाराणसी Jan 30, 2018 09:46 PM IST

वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के दायरे में आने से जीवन रक्षक दवाएं 28 प्रतिशत तक महंगी हो चली है। इसका मुख्य कारण दवाओं पर पांच प्रकार का कर लगाया जाना है। वहीं करमुक्त आवश्यक दवाआं को भी जीएसटी के दायरे में लाया गया है जिससे दवाओं के महंगे होने से गरीब मरीजों की मुसीबत बढ़ गई है। वहीं दवाओं को कर मुक्त घोषित कराने के लिए देश भर के दवा कारोबारी वाराणसी समेत पूर्वांचल के दवा कारोबारियों से संपर्क कर बड़े आंदोलन की रणनीति तैयार कर रहे हैं। ऑल इंडिया आर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट ऐंड ड्रगिस्ट (एआईओसीडी) के पूर्व महासचिव एवं केमिस्ट ऐंड ड्रगिस्ट फेडरेशन उत्तर प्रदेश के महामंत्री सुरेश गुप्ता ने वाराणसी में कहा कि दवाओं को कर मुक्त कराने की मांग पर सड़क पर उतरेंगे और भारत बंद भी कर सकते हैं।
 
गुप्ता ने कहा कि पहले दवाओं पर वैट समेत सभी प्रकार के कर मिलाकर सिर्फ 12 फीसदी था, लेकिन जीएसटी में इसे सभी स्लैब में डाल दिया गया है। मसलन दवाओं पर शून्य, 5, 12, 18 एवं 28 फीसदी कर लगाया गया है। इससे न सिर्फ दवाएं महंगी हुई हैं बल्कि कारोबारियों को कारोबार से ज्यादा दस्तावेजों में उलझना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि जीएसटी लागू होने के पूर्व सरकार से निवेदन किया गया था कि जनहित में दवाओं को करमुक्त रखा जाए या फिर बहुत जरूरी हो तो सिर्फ 5 फीसदी कर लगाया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। करमुक्त वैक्सीन, एचआईवी, क्षयरोग आदि दवाएं भी कर के दायरे में लाया गया है। करमुक्त आयुर्वेदिक दवाओं पर जीएसटी के तहत 12 फीसदी कर लगाया गया है जबकि जड़ी-बूटी वाली दवाओं पर 5 फीसदी।  गुप्ता ने कहा कि केंद्र सरकार दवा कारोबारियों के निवेदन पर ध्यान नहीं दे रही है। ऐसे में 25 फरवरी को कोलकाता में आयोजित एआईओसीडी की बैठक में बड़े आंदोलन की रूपरेखा तय की जाएगी। इसमें भारत बंद का आह्वान भी किया जा सकता है।
 
दवा के सालाना कारोबार में वृद्धि
 
एआईओसीडी के पूर्व महासचिव सुरेश गुप्ता ने कहा कि जीएसटी के पूर्व देश भर में दवा का सालाना कारोबार जहां 76 हजार करोड़ रुपये का था वहीं अब बढ़कर 89 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया है। निश्चित रूप से इसमें कर की अहम भूमिका है। आने वाले दिनों में एक लाख करोड़ रुपये का कारोबार हो जाएगा। तब सरकार को 12 से 15 हजार करोड़ रुपये कर मिलेगा। 
 
लाइसेंस लेने की प्रक्रिया जटिल 
 
देश में दवा कारोबार का लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया न सिर्फ जटिल कर दी गई है जो ड्रग ऐंड कास्मेटिक एक्ट 1940 का उल्लंघन भी है। एक्ट के तहत थोक का लाइसेंस लेने के लिए फार्मासिस्ट की अनिवार्यता नहीं है। लेकिन अब एफडीए ने एक नया आदेश जारी कर लाइसेंस लेने के लिए अनुभव प्रमाण पत्र (जिस दुकान पर काम किए हैं, वहां की सैलरी स्लिप, श्रम विभाग में पंजीयन आदि) देना अनिवार्य कर दिया है। इस आदेश से रोजगार का संकट उत्पन्न होगा।
 
ई-वे बिल से मुक्त रखने की मांग
 
वाराणसी में दवा कारोबारियों ने कारोबार को ई-वे बिल से मुक्त रखने की मांग की है। कारोबारियों ने कहा कि ई-वे बिल के तहत माल के परिवहन का समय महज 24 घंटे ही निर्धारित किया गया है। शहरी क्षेत्र में तो यह संभव है, लेकिन गैर जिलों में इतने कम समय में माल भेजना संभव नहीं होगा। इसका लाभ उठाते हुए विभागीय अधिकारी दवा कारोबारियों को प्रताडि़त करेंगे। इससे कारोबारियों का जहां शोषण होगा वहीं भ्रष्टाचार बढ़ेगा।
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