अतिथि शिक्षकों की भर्ती मामले में लोक आयोग में मामला दर्ज

बीएस संवाददाता | जगदलपुर Feb 05, 2018 10:08 PM IST

बस्तर विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक भर्ती गड़बड़ी की शिकायत लोक आयोग तक पहुंच गई है। लोक आयोग में अवमानना याचिका और अतिथि शिक्षक भर्ती की मेरिट सूची जारी नहीं किए जाने के मामले में विवि प्रशासन के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया गया है। बताया गया है कि इसी प्रकरण में कुछ एेसे अभ्यर्थी, जिन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया है, वे हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। बताया गया है कि हाल ही में बस्तर प्रवास पर पहुंचे उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडे के निर्देशों को दरकिनार करते हुए अब तक मेरिट सूची चस्पा नहीं की गई है। भर्तियों में हुई गड़बड़ी की लगातार मिल रही शिकायतों के बावजूद कुलपति शहर नहीं लौटे हैं। उनकी अनुपस्थिति में कुलसचिव मंत्री के निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए बगैर मेरिट सूची जारी किए और बिना दावा-आपत्ति बुलवाए ही चयनितों को एकतरफा ज्वाइनिंग करवा रहे हैं। बीयू सूत्र यहां तक बता रहे हैं कि सूची में किसी भी जिम्मेदार के हस्ताक्षर न होना भी संदेहों को जन्म दे रहा है। 
 
हस्ताक्षर युक्त मेरिट जारी नहीं होने की स्थिति में प्रभावित उच्च न्यायालय की शरण भी नहीं पा सकेंगे। इधर बीच सत्र में संविदा प्राध्यापकों की सेवाएं समाप्त करने और अतिथि भर्ती को लेकर चल रहे तमाम विवादों के बीच अध्ययनशाला में अध्यापन व्यवस्था पूरी तरह से ठप बताई गई है। 
 
कैसे शुरू हुआ विवाद 
 
गौरतलब है कि बस्तर विश्वविद्यालय में 7 वर्षों से बतौर संविदा प्राध्यापक सेवारत रहे डा अनुपम तिवारी की कंप्यूटर प्रकरण में अहम गवाही लोक आयोग में हुई थी। इसके बाद बीयू के कुछ प्रमुख जिम्मेदार एक्सपोज हुए थे। अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए संविदा प्राध्यापक डॉ तिवारी को सहायक कुलसचिव बताया गया था और एफआईअर करवाई गई थी। लोक आयोग ने इसके पश्चात यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए थे। जबकि विवि ने डा तिवारी ही नहीं, सभी संविदा प्राध्यापकों की सेवाएं स्वत: समाप्त बताकर लोक आयोग के आदेश की एक तरह से अवहेलना की थी। इसी एफआईआर को आधार बनाकर डा तिवारी को अतिथि शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था। 
 
क्या कहना है प्रभावित का
 
संविदा प्राध्यापक और अध्ययन मंडल के सदस्य रह चुके डा अनुपम तिवारी ने बताया कि वे 2010 से लगातार 7 वर्षों तक सभी योग्यता रखते हुए संविदा प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे। ग्रामीण प्रौद्योगिकी विषय में एकमात्र पीएचडी धारक हैं, परंतु मेरिट सूची में इनका नाम नहीं था। कुलपति और कुलसचिव चूंकि शहर में उपलब्ध नहीं थे, लिहाजा दोनों को तात्कालिक रूप से टेलीफोन के जरिए वस्तुस्थिति से अवगत करवाया गया। कुलपति ने तब उन्हें आपत्ति आवेदन लगाने की सलाह दी थी।
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