लोकतांत्रिक ताकतों को साथ आने की जरूरत

आदिति फडणीस |  Feb 05, 2018 10:13 PM IST

बीएस बातचीत

कम्युनिस्ट नेता डी राजा ने आदिति फडणीस से कहा कि विपक्षी दलों को अपनी हठधर्मिता छोड़कर साथ आने की जरूरत है। देश के धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतंत्रिक मूल्यों पर मंडरा रहे खतरों को देखते हुए विपक्षी दलों को आत्ममंथन की जरूरत है।

बजट सत्र शुरू हो चुका है। विपक्षी दलों की एक बैठक हुई थी जिसमें आप भी भाकपा के नेता के रूप में मौजूद थे। आपकी नजर में विपक्षी एकता किस दिशा में जा रही है?

जहां तक मेरी पार्टी का संबंध है तो देश की मौजूदा परिस्थिति के मद्देनजर सभी धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक ताकतों और वामपंथी दलों के एकजुट होने का समय आ गया है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ज्यादतियों का विरोध करने के लिए सभी विपक्षी दलों को साथ आने की जरूरत है। हमें सभी लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक मंच पर लाने की दिशा में बढऩा चाहिए ताकि लोगों को यह संदेश दिया जा सके कि देश और जनता के हितों को हर हाल में सुरक्षित रखा जाएगा। अभी पूरे देश में भय का माहौल है। लोगों के संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले बढ़ रहे हैं। दक्षिणपंथी ताकत पूरे देश में नफरत का माहौल पैदा कर रहे हैं। आरएसएस से जुड़े संगठन इसमें लिप्त हैं। हम उन्हें कैसे रोकेंगे? जो पार्टियां धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करती हैं और उन्हें बचाना चाहती हैं, उन्हें साथ आना चाहिए।

प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने हमेशा कहा है कि वे इसका समर्थन नहीं करते और उनकी संविधान के धर्मनिरपेक्ष या लोकतांत्रिक प्रारूप को बदलने की कोई मंशा नहीं है। तो क्या बेवजह ऐसी बातें की जा रही हैं?

प्रधानमंत्री ने कम से कम तीन बयान दिए हैं अलग-अलग संदर्भों में। लेकिन उनके बयानों को उनकी पार्टी और उससे जुड़े संगठनों ने कितनी गंभीरता से लिया है, यह अलग मुद्दा है। उदाहरण के लिए गौरक्षा की बात लें। यह भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में गौरक्षा के नाम पर हिंसा हो रही है। इन राज्यों सरकारें क्यों दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है? लव जिहादी संगठनों के खिलाफ सरकारें चुप क्यों हैं? अगर प्रधानमंत्री के निर्देशों के बावजूद ऐसा हो रहा है तो फिर हमें पूछना चाहिए क्या प्रधानमंत्री लाचार हैं? मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो हिंसा में लिप्त लोगों को शरारती तत्त्व या संगठन कहते हैं। वे विचारधारा से प्रभावित लोग हैं जिन्हें पता है कि उन्हें कानून अपने हाथ में लेने की छूट मिली है। एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जो लोग धर्मनिरपेक्ष संविधान में विश्वास करते हैं उन्हें अपने माता-पिता के बारे में पता नहीं है। क्या किसी मंत्री को इस तरह की बातें करनी चाहिए? उन्होंने कहा कि मोदी सरकार संविधान में बदलाव करने के लिए सत्ता में आई है। इस बयान पर उनको फटकार पड़ी थी। उन्हें फटकार नहीं पड़ी थी। यह मुद्दा संसद में उठा था। वह मंत्री वहां मौजूद थे लेकिन उन्होंने अपने बयान के बारे में स्पष्टीकरण नहीं दिया और न ही माफी मांगी। सरकार और पार्टी ने उनसे स्पष्टीकरण नहीं मांगा। जब सदन में हंगामा हुआ तो उन्होंने बयान पर खेद जताया और भाजपा ने खुद को उनके बयान से अलग किया। 

कर्नाटक में क्या हो रहा है? वे कह रहे हैं कि हमें मुस्लिम वोट नहीं चाहिए, हमें केवल हिंदू मतों की जरूरत है। लोगों की दूसरी समस्याएं हैं। उन्हें रोजी रोटी चाहिए, रोजगार चाहिए, शिक्षा और इलाज की व्यवस्था चाहिए। ये लोगों के असली मुद्दे हैं लेकिन इनसे ध्यान भटकाया जा रहा है। बेरोजगारी की वजह से युवाओं में रोष है। लेकिन उनकी समस्याओं को सुलझाने के बजाय उन्हें असल मुद्दों से भटकाया जा रहा है।

जो कुछ हो रहा है क्या उसके लिए विपक्ष जिम्मेदार नहीं है क्योंकि आप साथ आने में नाकाम रहे? विपक्ष में ऐसे भी दल हैं जो आपसी मतभेद ही दूर नहीं कर पा रहे हैं, एकदूसरे के साथ सहमति की बात को छोडि़ए। यही वजह है कि आप राजग के मतभेदों का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं?

धर्मनिरपेक्ष मूल्यों, लोकतंत्र और संविधान में विश्वास करने वाले विपक्षी दलों के एकजुट होने का समय आ गया है। हर दल को गंभीरता के साथ आत्ममंथन करना होगा। उन्हें पहले आंतरिक तौर पर आपसी समझ कायम करनी होगी। फिर सभी दलों को विभिन्न मुद्दों पर साझा समझ बनानी होगी। हम यही प्रयास कर रहे हैं। शरद यादव को जनता दल यूनाइटेड से बाहर कर दिया गया था और उन्होंने देश की गंगा जमुनी संस्कृति को बचाने के लिए आंदोलन शुरू किया। उन्होंने देशभर में बैठकें कीं जिनमें सभी दलों ने हिस्सा लिया। 26 जनवरी को शरद पवार ने संविधान बचाओ मार्च आयोजित किया। उसमें उमर अब्दुल्ला से लेकर हार्दिक पटेल तक शामिल हुए। तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दलों और कांग्रेस ने इसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। 

लेकिन इसी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने गुजरात में दो मौकों पर कांग्रेस को जीत से रोका था। एक बार वह नाकाम रही पर दूसरी बार सफल रही। यह पी चिदंबरम और पृथ्वीराज चव्हाण जैसे कांग्रेस के नेता भी कह रहे हैं?

मैं इस मुद्दे पर आऊंगा। मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूं कि मुद्दों पर आधारित अभियान पार्टियों को साथ लेकर आए। जब चुनाव की बात होती है तो यह अलग मामला है क्योंकि चुनाव राज्य विशेष में होते हैं। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) कहती रही है कि राजनीतिक कारणों से उसका कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन नहीं हो सकता है। सार्वजनिक मंचों पर इस पर बहस हो रही है। गुजरात में कांग्रेस राकांपा और दूसरे दलों को साथ ला सकती थी। वहां व्यापक चुनावी समझ हो सकती थी। हो सकता है कि अब इससे सबक सीखा गया हो। 

गुजरात अब पुरानी बात हो चुकी है। अब आगे क्या?

अब तक एक मिथक बनाया गया था कि भाजपा के रथ को रोका नहीं जा सकता है। दूसरा मिथक यह था कि नरेंद्र मोदी अजेय हैं। अब ये मिथक टूट चुके हैं। उदाहरण के लिए पिछले दौर के चुनावों में भाजपा पंजाब में नहीं जीती। अगर आप चुनावी रूप से देखें तो गोवा और मणिपुर में भी पार्टी नहीं जीती। लेकिन पार्टी ने जोड़तोड़ करके इन राज्यों में सरकार बना ली। बिहार में भाजपा चुनाव नहीं जीती थी। उसने वहां सत्तारूढ़ गठबंधन को तोड़ा और खुद सरकार में शामिल हो गई, यह अलग मुद्दा है। लेकिन नैतिक और राजनीतिक रूप से कहें तो भाजपा ने चुनाव नहीं जीता था। उपचुनावों में उसे भारी अंतर से हार का सामना करना पड़ा। हाल में राजस्थान और पश्चिम बंगाल में भाजपा को सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। लोगों को यह समझना चाहिए। भाजपा पतन पर है और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों तथा लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले विपक्षी दलों के पास लोगों के बीच जाने का यह सही समय है।

कांग्रेस को अगुआई देकर आप संतुष्ट होंगे?

मुद्दा किसी की अगुआई का नहीं है। जरूरी यह है कि हम सभी को संसद के भीतर और बाहर भी मिलकर काम करना चाहिए। कुछ राज्यों में मुश्किलें हो सकती हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हमें मिलकर काम करना चाहिए। इस बात पर सभी दलों में सहमति है। जहां तक नेतृत्व का सवाल है तो जिस पार्टी की जिस राज्य में सर्वाधिक उपस्थिति है, उसे अगुआई करनी चाहिए। निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है।

आप पहले भी कांग्रेस के साथ काम कर चुके हैं। कांग्रेस की कौन सी बात अच्छी है और कौन सी खराब लगती है?

वर्ष 1996 में जब संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी थी तो कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था। हम न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमत थे। बाद में वह सरकार सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) बना। वामपंथी दलों ने उसकी सरकार को बाहर से समर्थन दिया। तब भी न्यूनतम साझा कार्यक्रम था लेकिन जब-जब इससे भटकने की कोशिश हुई, तब-तब समस्या पैदा हुई। एक बार भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड के विनिवेश के मामले में हमारा मतभेद हुआ था। सोनिया गांधी ने इसमें दखल दिया और वह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। हमने फिर से साथ काम करना शुरू कर दिया है। मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि एक कार्यक्रम था जिससे हम साथ जुड़े हुए थे। सभी तरफ से प्रतिबद्घताएं थीं। प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव के जमाने में जब आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लाई गईं तो वामपंथी दलों ने इसका विरोध किया था। लेकिन परिस्थितियां बदल रही थीं और भाजपा उभर रही थी और संदर्भ बदल रहा था। जब हम सरकार में थे तो हमने सरकार को जन कल्याण का रास्ता अपनाने के लिए प्रभावित किया। लेकिन संप्रग के दूसरे कार्यकाल के दौरान कुछ ऐसी नीतियां बनीं जिनसे मोदी का काम आसान हो गया। कांग्रेस को लोगों के लिए संघर्ष करने की नेहरू की विरासत पर लौटना होगा। साथ ही वामपंथी दलों को भी कुछ आत्ममंथन करना होगा। हमें खुद में जान फूंकनी होगी। यह कठिन काम है।
कीवर्ड D raja, comunist,

  
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