महाराष्ट्र में फसलें खराब होने से बढ़ा संकट

अभिषेक वाघमारे | नई दिल्ली Mar 11, 2018 10:59 PM IST

सड़क पर किसान

दो साल में किसानों के दूसरे बड़े प्रदर्शन से भाजपा शासित राज्य में राजनीतिक संकट
बेहतर उत्पादन के बाद अगले ही साल बारिश कम होने से घटा उत्पादन
किसानों का आरोप है कि कर्जमाफी और वन अधिनियम सही तरीके से लागू न करने से बढ़ी समस्या
कपास की उत्पादकता प्रति एकड़ महज एक क्विंटल
जीन संवर्धित बीज भी कपास की खेती को कीटों के हमले से नहीं बचा सके
सरकार ने 340 अरब रुपये की कर्जमाफी में से सिर्फ 139 अरब रुपये जारी किए, सभी किसानों को नहीं मिला लाभ

महाराष्ट्र के तमाम जिलों के 30,000 से ज्यादा किसान 5 मार्च को नासिक से 'लंबी यात्रा' पर निकले हैं। मुंबई से 170 किलोमीटर उत्तर स्थित कृषि के प्रमुख केंद्र से चलकर किसान रविवार को मुंबई पहुंचे और सोमवार को  उनकी योजना राज्य विधानसभा का घेराव करने की है। प्रदर्शन कर रहे किसान नेताओं का आरोप है कि किसानों का कर्ज माफ करने की उनकी मांग पूरी नहीं हुई। इसके अलावा अनुसूचित जनजातियों के लाभ के लिए  जून 2017 में स्वीकार किया गया वनाधिकार अधिनियम पूरी तरह से और सही तरीके से लागू नहीं किया गया है।

राज्य की आर्थिक समीक्षा के अनुमान के मुताबिक कृषि क्षेत्र में आई 8 प्रतिशत की कमी और फसल उपक्षेत्र में 14 प्रतिशत की कमी से कृषि क्षेत्र में संकट और बढ़ गया है। पश्चिमी राज्य में 2017 के मॉनसून सत्र में जून से अक्टूबर के बीच बारिश औसत बारिश का 84 प्रतिशत रही, जो क्षेत्र के मुताबिक अलग अलग है। सूखा प्रभावित विदर्भ में औसत से 20 प्रतिशत कम बारिश हुई है। कीटों के हमले से समस्या और बढ़ी और कपास की खड़ी फसलें (अन्य क्षेत्रों में धान भी) प्रभावित हुईं। राज्य की आर्थिक समीक्षा और किसान इस बात को लेकर एकमत हैं।

2016-17 में राज्य में खाद्यान्न और कपास का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था और कृषि क्षेत्र में 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।  उसके बाद चालू साल में संकुचन आया है। यह ठीक उसी तरह की स्थिति पैदा हुई है, जैसा कि 2013-14 और 2014-14 में हुई थी जब कृषि क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत की तेजी के बाद उसके अगले साल ही 10.7 प्रतिशत का संकुचन आया। हालांकि उस समय मॉनसूनी बारिश की स्थिति इस बार से खराब थी, लेकिन इस बार भी वृद्धि का हाल पहले जैसा ही बुरा है। इसके अलावा विरोध प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने आरोप लगाया है कि कृषि क्षेत्र को दिया जाने वाला कर्ज (खरीफ व रबी दोनों में) राज्य में 2016-17 के 430 अरब रुपये से घटकर 2017-18 में 220 अरब रुपये हो गया।

दक्षिणी महाराष्ट्र के किसान नेता और सांसद राजू शेट्टी ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा, 'इस सत्र में बैंक किसानों को कर्ज देने से बचते रहे क्योंकि कृषि कर्जमाफी योजना बहुत खराब तरीके से लागू की गई है। इसके परिणामस्वरूप किसानों के पास खेती करने के लिए बहुत कम पैसे बचे।'

राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने जून 2017 में छत्रपति शिवाजी महराज शेतकारी सम्मान योजना के तहत 340 अरब रुपये के कर्जमाफी पैकेज की घोषणा की गई थी जिससे 89 लाख किसानों को लाभ मिल सके। बजट नोट में कहा गया है कि इस योजना के तहत 6 मार्च 2018 तक सिर्फ 139 अरब रुपये जारी किए गए हैं, जिसका लाभ 36 लाख किसानों को मिला है।

कृषि राज्य मंत्री सदाभाऊ खोटे ने इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं की, लेकि न इसे राजनीतिक दुर्भावना से लगाया गया आरोप बताते हुए कहा कि विपक्षी दलों का राज्य सहकारी बैंकोंं पर नियंत्रण है। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा, 'महाराष्ट्र की कर्जमाफी योजना पूरे राज्य के किसानों के  लिए है, जिसमें ज्यादातर किसानों को लाभ मिला है। हमने कृषि क्षेत्र को कर्ज देने वाले राष्ट्रीयकृत बैंकों का भी ध्यान रखा है।'

इस साल विदर्भ में बारिश की स्थिति गंभीर रहने के कारण कपास की फसल पर पिंक बॉलवर्म नामक कीटों का अप्रत्याशित हमला हो गया। विरोध मार्च में हिस्सा ले रहे अकोला जिले के किसान नेता प्रशांत गवांडे ने कहा, 'सिंचित कपास क्षेत्रों में कीटों के  हमले से स्थिति ज्यादा गंभीर हुई और जीन संवर्धित बीटी कपास की फसल को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ।' उन्होंने कहा कि जीएम किस्म कीटों के हमले से बचाने में पूरी तरह विफल रही है।

किसानों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे के साथ प्रदर्शन मार्च किया, जबकि इसमें हिस्सा लेने वाले किसान नेताओं का कहना है कि इसका नेतृत्व कोई विशेष दल नहीं कर रहा है। राज्य सरकार ने 23 फरवरी को एक प्रस्ताव (जीआर) जारी किया था, जिसमें वादा किया गया था कि अधिकतम 2 हेक्टेयर तक 13,500 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा।

यह घोषणा उन कपास और धान किसानों के लिए की गई थी, जिनकी 33 प्रतिशत से ज्यादा फसल खराब हो गई है। इससे बहुसंख्य किसान नाराज हो गए क्योंकि जीएम किस्म की खेती की लागत बहुत ज्यादा आती है। सरकार से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिए कि इस फैसले का लाभ सीमित संख्या के किसानों को मिलता, जिसकी वजह से असंतोष बढ़ा और लगातार दूसरे साल दूसरा बड़ा प्रदर्शन हो रहा है।

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