बंद चीनी मिलों की जमीन जल्द देने की मांग

बीएस संवाददाता | पटना Apr 25, 2018 09:42 PM IST

बिहार के उद्योग संघों ने राज्य सरकार से जल्द से जल्द बंद पड़ी चीनी मिलों को निवेश के लिए खोलने का आग्रह किया है। उन्हें इस प्रक्रिया से कम से कम 2,300 एकड़ जमीन मिलने की उम्मीद है। उनके मुताबिक इससे राज्य में निवेश को भी रफ्तार मिलेगी। दरअसल, राज्य सरकार ने पिछले दिनों अपनी बंद पड़ी 7 चीनी मिलों को बिहार औद्योगिक भूमि विकास प्राधिकार (बियाडा) को सौंपने की इच्छा जताई थी। राज्य के अलग-अलग इलाकों में मौजूद इन मिलों का प्रचालन बीते 20-25 वर्षों से बंद पड़ा हुआ है। इस बारे में राज्य का गन्ना उद्योग विभाग भी तैयार हो गया है। 
 
विभाग के एक अधिकारी ने बताया, 'चीनी उद्योग के लिहाज से इन मिलों ने पास वैसे तो काफी कम जमीन है, लेकिन दूसरे उद्योगों के लिहाज से इनके पास काफी जमीन है। ये मिल भी अच्छे इलाकों में स्थित हैं। इस वजह से इन्हें औद्योगिक पार्क के रूप में विकसित करने का अच्छा मौका है। इस संबंध में सैद्धांतिक सहमति भी दी जा चुकी है। हालांकि, इस बारे में पहल उद्योग विभाग को करना है। इसके बाद हमारी ओर से एक प्रस्ताव राज्य मंत्रिमंडल के पास भेजा जाएगा, जहां से मंजूरी के बाद ये सारी जमीन उद्योग विभाग को मिल जाएगी।' 
 
इस प्रक्रिया से राज्य सरकार को उद्योगों के वास्ते 2,265 एकड़ जमीन मिलेगी।  दूसरी तरफ, इस प्रक्रिया में हो रही देरी की वजह से राज्य के उद्योग संघों से बिहार सरकार ने प्रक्रिया में तेजी लाने का आग्रह किया है। बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष पी के अग्रवाल ने कहा, 'राज्य में औद्योगिक भूमि की किल्लत को देखते हुए राज्य सरकार ने यह फैसला लिया था। हालांकि, अब तक गन्ना उद्योग विभाग की ओर से जमीन हस्तांतरित नहीं की जा सकी है। इससे बियाडा के लिए नए उद्योगों को जमीन देने में दिक्कतें आ रही हैं। इससे राज्य में निवेश के प्रस्तावों को धरती में उतारने में दिक्कत हो रही है। कुछ दिनों पहले राज्य सरकार को ब्रिटानिया, अशोक बिल्डकॉन, प्रिंस पाइप्स और जुपिटर हॉस्पिटल्स की ओर से निवेश के प्रस्ताव मिले। ऐसी स्थिति में अगर इन्हें जमीन नहीं मिली तो इनके लिए बिहार आना मुश्किल होगा। गन्ना उद्योग विभाग को इस बारे में तेज गति से काम करना चाहिए।'  राज्य में निवेश के ज्यादातर प्रस्ताव भूमि की किल्लत की वजह से वास्तविकता में नहीं उतर पाते हैं। बीते 12 वर्षों में बिहार में निवेश के 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के प्रस्ताव आए, लेकिन इनमें से महज 8 हजार करोड़ रुपये का ही निवेश हो पाया।
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