'तेल की कीमतों पर हम बना रहे हैं दीर्घकालीन रणनीति'

दिलीप सत्पथी |  Jun 13, 2018 09:55 PM IST

केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अहम मंत्रियों में से एक हैं। उन्होंने तेल के दाम में बदलाव व हाल के दिनों में राजनीतिक आलोचनाओं को लेकर दिलीप सत्पथी के साथ बातचीत की। प्रमुख अंश...

 
पिछले 8-10 दिन से पेट्रोलियम के दाम गिर रहे हैं। अगले 6 महीने में क्या स्थिति रहेगी?
 
कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम के बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकता। कुछ लोगों का कहना है कि दाम बढ़ेंगे, वहीं कुछ उम्मीद कर रहे हैं कि दाम स्थिर रहेगा। वहीं कुछ लोगों को मानना है कि मौजूदा स्तर से कीमतें कम होंगी। किसी भी राय को पूरी तरह स्वीकार या खारिज नहीं किया जा सकता है। यह सही है कि कच्चे तेल के दाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन हम इसे नियमित कर सकते हैं। इसके पहले कच्चे तेल के उत्पादक तेल के दाम तय करते थे। अब तेल के उपभोक्ता देशों को महत्त्व मिल रहा है। इसकी दो प्रमुख वजहें हैं। पहला- कच्चे तेल उत्पादकों के बॉस्केट का दायरा बढ़ा है। अमेरिका पहले कच्चे तेल का शुद्ध आयातक था और अब शुद्ध निर्यातक बन गया है।  
 
अमेरिका शुद्ध निर्यातक बन गया है, अंतरराष्ट्रीय दाम पर इसका असर होगा?
 
हां। लेकिन यह हमारे अनुमान के मुताबिक नहीं रहा है। अमेरिका में संसाधन की उपलब्धता और उत्पादन क्षमता है, लेकिन भंडारण और परिवहन की सुविधा पर्याप्त नहीं है। पिछले 2 से 3 साल तक तेल की कीमतें कम रहीं। अगर आप पिछले 3-4 साल की स्थिति देखें तो अन्वेषण, उत्पादन और नई सुविधा विकसित करने में निवेश कम हुआ है। निवेश गिरा है, इसकी वजह से आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है और कीमतें बढ़ी हैं। इसके अलावा तेल उत्पादन करने वाले देशों की आंतरिक राजनीति का भी उत्पादन पर असर पड़ है। वेनेजुएला और लीबिया में अव्यवस्था रही। ईरान भी जटिलताओं से जूझ रहा है। इन सभी वजहोंं से तेल की अर्थव्यवस्था में नकारात्मक धारणा विकसित हुई है। 
 
ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंध के बाद क्या भारत बाद के समय में सस्ते कच्चे तेल की उम्मीद कर सकता है?
 
यह आसान नहीं होने जा रहा है। यहां तक कि आज भी ईरान के कच्चे तेल के दाम अन्य देशों की तुलना में कम है। लेकिन जब प्रतिबंध लागू होता है तो इसका असर होता है। 
 
ओपेक द्वारा उत्पादन में कटौती इस साल खत्म होने की उम्मीद है?
 
ओपेक ने 15 साल के लिए घोषणा की थी... लेकिन बाद में उन्होंने घोषणा की कि प्रतिदिन 1.8 अरब बैरल कम उत्पादन होगा। लेकिन वेनेजुएला जैसे कुछ क्षेत्रों में स्वत: उत्पादन कम हो जाने की वजह से कुल उत्पादन 2.75 अरब बैरल प्रति दिन हो गया। इसका असर कीमतों पर पड़ा।
 
क्या रूस से हमें कुछ कच्चे तेल की आपूर्ति हो सकती है?
 
रूस से तेल लेना हमारे लिए चुनौती है। फिलहाल हमें गैस मिल रही है। दूरी की वजह से मुश्किल है। 
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