चंदा कोछड़ के सामने बड़ी चुनौती

पवन लाल और अनूप रॉय |  Apr 11, 2018 10:40 PM IST

वीडियोकॉन ऋण विवाद

अपने करियर के कठिन दौर से गुजर रही हैं चंदा कोछड़

चंदा कोछड़ भले ही देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई बैंक की प्रमुख बन गईं लेकिन असल में वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की अधिकारी बनना चाहती थीं। जयपुर में जन्मीं चंदा ने जय हिंद कॉलेज से स्नातक और मुंबई के जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज से एमबीए करने के बाद बैंकिंग का रुख किया। मुंबई के संस्थान में कैंपस साक्षात्कार के दौरान उनकी मुलाकात के वी कामत से हुई। वह 1984 में आईसीआईसीआई बैंक से जुड़ीं और फिर बैंक में प्रबंध निदेशक तथा मुख्य कार्याधिकारी तक का मुकाम हासिल किया।

वर्ष 2008 में जब लीमन ब्रदर्स ने दिवालिया होने की अर्जी दी उस वक्त आईसीआईसीआई बैंक की उधारी न्यूनतम थी लेकिन उस समय कुछ अन्य बैंकों की तरह वह भी थोक जमा पर निर्भर था। ऐसा इसलिए था क्योंकि बैंक जानबूझकर असुरक्षित खुदरा बैंक ऋण पर जोर देने लगा था। लीमन के दिवालिया होने से फंड जुटाने की बैंक की क्षमता पर दबाव आ गया। लीमन  के अप्रत्यक्ष परिणामों से भारतीय अर्थव्यवस्था  भी दबाव में थी।

आईसीआईसीआई बैंक के ग्राहकों में बड़ी संख्या में कंपनियां शामिल थीं जो मंदी की तपिश महसूस कर रही थीं। बैंक का बाजार पूंजीकरण मार्च 2008 में 857 अरब रुपये था लेकिन एक साल बाद यह 370 अरब रुपये ही रह गया। उसका फंसा कर्ज बढ़ता ही जा रहा था। चंदा उस समय बैंक की मुख्य वित्तीय अधिकारी और संयुक्त प्रबंध निदेशक थीं। वर्ष 2009 में कम से कम 3 शीर्ष अधिकारियों को नजरअंदाज करते हुए उन्हें बैंक की कमान सौंपी गई। के वी कामत के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी मिली थी। अपनी मेहनत के दम पर चंदा बैंक का चेहरा बन गईं। वह दिन के वक्त न्यूयॉर्क जातीं और फिर बोर्ड बैठक के लिए समय पर स्वदेश लौट आतीं।

वह खुद ही निवेशकों और मीडिया को संबोधित करती थीं। उन्होंने बिना समय गंवाए बैंक को पटरी पर लाने की कोशिशें शुरू कर दीं। परिचालन लागत में कटौती की और विदेशों में अधिग्रहण से परहेज किया जबकि ये सौदे सस्ते थे। उनका जोर दीर्घावधि वित्तीय दायित्वों को पूरा करने, असुरक्षित ऋण से बाहर निकलने और बैंक को मजबूत बनाने पर था।

चंदा ने कई कदम उठाकर आईसीआईसीआई बैंक को विकास के अगले दौर में पहुंचाया। इनमें बैंक ऑफ राजस्थान का करीब 30 अरब रुपये में अधिग्रहण और 2009 से 2011 के बीच देशभर में 600 शहरों में शाखाओं की संख्या 1,400 से बढ़ाकर 2,500 करना शामिल है। वर्ष 2014 के अंत तक बैंक का एनपीए अनुपात 5 फीसदी से घटकर 3 फीसदी रह गया था। 

उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि उन्हें साड़ि‍यों और गहनों की खरीदारी का बड़ा शौक है। ये साड़‍ियां और गहने ही उनकी पहचान बन गई। साथ ही उन्हें हिंदी फिल्मों का भी बहुत पसंद है। इस साल उन्होंने अपने व्यस्त कार्यक्रम में से एक मीडिया आयोजन के लिए समय निकाला जिसमें उन्हें अभिनेत्री दीपिका पडुकोणे से बातचीत करनी थी। जब पडुकोणे ने उनसे पूछा कि अगर वह फिल्म उद्योग में होतीं तो क्या काम करतीं, इस पर उनका कहना था कि शायद वह कलाकारों के कार्यक्रम और खानेपीने का प्रबंधन करतीं।

वर्ष 2013 में आईसीआईसीआई बैंक ने एक ऐप शुरू कर डिजिटल की दुनिया में कदम रखा। यह ग्राहकों के खातों की जानकारी देता है और फेसबुक के जरिये पैसे भेजने की भी सुविधा देता है। प्रौद्योगिकी एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें आईसीआईसीआई बैंक दूसरे बैंकों से कहीं आगे हैं। चंदा को कोयला और गैस आपूर्ति से जुड़ी समस्याओं का समाधान सुझाने के लिए बिजली मंत्रालय के अधीन एक समिति की अगुआई करने को कहा गया। अगले वर्ष आईसीआईसीआई बैंक 100 अरब रुपये का बाजार पूंजीकरण पार करने वाला निजी क्षेत्र का पहला बैंक बन गया।

चंदा को जानने वाले एक वरिष्ठ बैंक ने कहा कि वह उन कुछ बैंकरों में शामिल हैं जो रिटेल और प्रोजेक्ट फाइनेंस की गहरी समझ रखते हैं। साथ ही बैंक ने 1.8 करोड़ से अधिक लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। वह किंगफिशर के कर्ज से पीछा छुड़ाने वाला एकमात्र बैंक था। बैंक ने न्यूनतम घाटे के साथ संबंधित ऋणों को 4.3 अरब रुपये में श्रेय को बेच दिया था। 

2014 के बाद आईसीआईसीआई बैंक पर फंसे कर्ज का बोझ बढऩे लगा था और चंदा इससे काबू नहीं कर सकीं। बैंक की शाखाएं भले ही तीन गुना बढ़कर 4,860 पहुंच गई थीं लेकिन मार्च 2017 के अंत तक फंसा कर्ज 460 अरब रुपये पहुंच चुका था। कुछ ही तिमाहियों में फंसे कर्ज ने न केवल बैंक के मुनाफे को प्रभावित किया बल्कि उसके कॉरपोरेट कारोबार को भी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। करीब 36 अरब रुपये के प्रावधान ने बैंक को 2016 में हुए मुनाफे पर पानी फेर दिया। एक साल बाद इसका सकल एनपीए अनुपात करीब 8 फीसदी पहुंच गया और दिसंबर 2017 तक भी इसी स्तर पर था। निजी बैंकों में यह सर्वाधिक है। अलबत्ता बैंक के मुनाफे के लिए अहम शुद्ध ब्याज मार्जिन दिसंबर 2017 में समाप्त तिमाही में बढ़कर 3.5 फीसदी पहुंच गया जो 2009 के 2.25 फीसदी था।

हालांकि पिछले 12-15 महीनों में कोछड़ ने बैंक का सही मूल्यांकन सामने लाने के लिए जीवन बीमा, साधारण बीमा और सिक्योरिटीज कारोबार को सूचीबद्ध करके सकारात्मक कदम उठाए। इन तीन कंपनियों का संयुक्त मूल्य 1.06 लाख करोड़ रुपये है। इन कंपनियों में बैंक की हिस्सेदारी की बिक्री से हुई कमाई का इस्तेमाल फंसे कर्ज को बट्टे खाते में डालने के लिए किया गया। हाल के दिनों में चंदा गलत कारणों से चर्चा में हैं। उन पर वीडियोकॉन को कर्ज देने में भूमिका निभाने का आरोप है। इसके बदले में वीडियोकॉन ने उनके पति दीपक कोछड़ की कंपनी में निवेश किया था।

चंदा की प्रतिक्रिया जानने के लिए उन्हें ईमेल किया गया लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बैंक के चेयरमैन एम के शर्मा ने भी टिप्पणी नहीं दी। आईसीआईसीआई बैंक के बोर्ड ने चंदा में पूरा भरोसा जताया है लेकिन जांच उनके पति और देवर तक पहुंच चुकी है। यह ऐसा मामला है जिसमें चंदा मुश्किलों में घिरी हैं। उद्योग के जानकार कहते हैं कि आईसीआईसीआई में चंदा की पूर्व सहयोगी शिखा शर्मा के दिसंबर में ऐक्सिस बैंक की कमान छोडऩे के फैसले से चंदा पर भी दबाव बढ़ गया है। यह देखना होगा कि वह इस स्थिति से खुद को किस तरह निकालती हैं।

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