सता रहे खाने से जुड़े विकार, अब नहीं रहिए लाचार

वीर अर्जुन सिंह |  May 01, 2018 09:53 PM IST

अक्षिता सिंघल की उम्र 18 वर्ष है और उसका वजन केवल 35 किलोग्राम है। जब उसे मनोचिकित्सक, पेट संबंधी विशेषज्ञ, न्यूट्रिशनिस्ट और उसके फैमिली फिजिशियन की एक टीम के पास स्वास्थ्य परीक्षण के लिए लाया गया और टीम ने उसे उसके बचपन की मनपसंद चॉकलेट खाने को दी तो उसने उसका एक छोटा सा हिस्सा भी खाने से मना कर दिया। सिंघल को भूख ना लगना (एनोरेक्सिया), हड्डिïयां कमजोर होना (ऑस्टीओपरोसिस) और खाने की नली में संक्रमण की बीमारी है। पहले उसे कई दिनों तक मनोचिकित्सक के पास ले जाया गया, जिसके बाद उसने इस इलाज के लिए सहमति दी।

 
सिंघल ऐसे अनेक भारतीय युवाओं में से एक है जो छरछरहे शरीर को पाने के जुनून में किसी भी हद को पार कर सकते हैं। 'पतला शरीर ही सुंदर है' इस विचार से भरा युवा दिमाग एक दशक पहले केवल आभासी अस्तित्व रखने वाले खाने के विकारों से भर चुका है। इनमें भूख ना लगना, खाना ना खाने की मानसिक बीमारी और जानबूझ कर एक बार में इतना अधिक खाना, जिससे उल्टी आ जाए (ब्युलिमिया) जैसे विकार एक गंभीर विषय बनते जा रहे हैं। एनोरेक्सिया एक मानसिक बीमारी की तरह है, जिसमे खाना खाने से इसलिए घृणा हो जाती है कि इससे वजन बढ़ जाएगा।  एनोरेक्सिया और ब्युलिमिया एक साथ भी हो सकते हैं। अधिक चिंता की बात यह है कि इन विकारों का आसानी से पता नहीं चलता और इस कारण इनका इलाज भी नहीं हो पाता। इनके छुपे रहने का एक बड़ा कारण यह है कि अधिकांश युवा अपने शरीर की संरचना और सुंदरता को लेकर गलत तथ्यों और मनगढ़ंत विचारों से भरे रहते हैं। जब इस कारण वे मानसिक समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं तब इनके शारीरिक दुष्प्रभाव बहुत तेज हो जाते हैं। अमेरिका स्थित राष्ट्रीय भोजन विकार एसोसिएशन (एनईडीए) के अनुसार, एनोरेक्सिया और ब्युलिमिया वजन बढऩे के भय से होने वाले सबसे खतरनाक विकार हैं जो किसी दूसरे मानसिक विकार से अधिक मौत का कारण बनते हैं। नैशनल एसोसिएशन ऑफ एनोरेक्सिया नर्वोसा और एसोसिएटेड डिसऑर्डर के अनुसार 60 करोड़ अमेरिकी एनोरेक्सिया से पीडि़त हैं। हालांकि गहन शोध के अभाव और मानसिक स्वास्थ्य को अनदेखा करने की आदत के चलते भारत में खाने से संबंधित विकारों का पता नहीं चल पाता।
 
नई दिल्ली स्थित फोर्टिस अस्पताल के मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार विज्ञान विभाग के प्रमुख समीर पारिख कहते हैं कि एनोरेक्सिया पुरूषों को भी प्रभावित करता है, हालांकि युवा महिलाओं में यह 10-15 गुना अधिक पाया जाता है। वह कहते हैं, 'खाने से संबंधित विकार ईगो-सिंटोनिक होते हैं। जिसका मतलब है कि इसमें मरीज को लगता है कि वह बिल्कुल स्वस्थ है और इस कारण वह उपचार के लिए मना कर देता है।' पारिख कहते हैं कि हालांकि एक व्यक्ति को अनुवांशिक कारणों से भी एनोरेक्सिया और ब्युलिमिया की समस्या हो सकती है, लेकिन इन मामलों की बढ़ती संख्या यह बताती है कि सामाजिक दवाब और सुंदरता की पश्चिमी मान्यताएं युवाओं पर काफी दवाब डाल रही हैं।
 
अवसाद भी इसका एक कारण हो सकता है। जिस तरह से एनोरेक्सिया और ब्युलिमिया के कारण अवसाद हो सकता है, उसी तरह अवसाद के कारण भी एनोरेक्सिया और ब्युलिमिया की बीमारी हो सकती है। रचित मलिक का मामला यह दिखाता है। 16 वर्ष की उम्र में मलिक का वजन 110 किलो था लेकिन उसके माता-पिता इसे लेकर अधिक चिंतित नहीं थे, जब तक कि उन्हें स्कूल से शिकायत नहीं मिली। वह पहले भी कई बार अपने सहपाठियों का भोजन चोरी कर खा चुका था और इस बार उसे चोरी करते हुए पकड़ लिया गया। उसके माता-पिता इसे एक शरारत भरा काम समझते थे और कोई खासा ध्यान नहीं देते थे। स्कूल प्रबंधन ने उन्हें बताया कि दोपहर के भोजन में बहुत अधिक खाना और ठीक बाद वाली क्लास छोड़ देना उसकी आदत बन गई है। दिल्ली के इस प्रतिष्ठित स्कूल को लगा कि कक्षा 12 के छात्र के लिए ऐसा व्यवहार सही नहीं है।
 
दिल्ली स्थित आकाश हेल्थकेयर की न्यूट्रिशनिस्ट तनु अरोड़ा ने कहा, 'जब माता-पिता बच्चे को लाए तो उसका वजन 130 किलो था। वे जल्दी से वजन घटाने वाली डाइट चाहते थे लेकिन बच्चे के एकदम अलग, चिड़चिड़े और सहयोग ना करने वाला व्यवहार एक बड़ी समस्या थी।' मनोवैज्ञानिक जांच और कई बार के परीक्षणों से यह पता चला कि मलिक ब्युलिमिया से पीडित था। अरोड़ा बताती हैं, 'वह पहले बहुत अधिक खाता था और बाद में उल्टी कर देता था। वह मानता था कि ऐसा करने से उसका शरीर अतिरिक्त कैलोरी से निजात पा लेगा।' मलिक अवसाद से भी ग्रसित था लेकिन उसके माता-पिता लगातार मना करते रहे। जब डॉक्टरों की एक टीम उसका इलाज कर रही थी और हालत में सुधार हो रहा था तो उसे एक मनोवैज्ञानिक के पास भेजा गया, जो खाने से जुड़ी आदतों का विशेषज्ञ था। लेकिन मलिक के माता-पिता ने उसे वापस बुला लिया। अरोड़ा लगातार मलिक के माता-पिता को इलाज जारी रखने के लिए समझाती रहीं। अरोड़ा ने कहा, 'उन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया कि ब्युलिमिया एक मानसिक बीमारी है और उसका इलाज सामान्य तरीके से नहीं हो सकता।'
 
उन्होंने बताया, 'वह उल्टी करने से पहले एक बार में 12 समोसे खा लेता था और उसे दर्द भी नहीं होता था। माता-पिता सोचते रहे कि वे उसको कम खाने की आदत में ढ़ाल लेंगे।' आखिरकार माता-पिता के मना करने के कारण अरोड़ा को यह केस छोडऩा पड़ा। इस तरह के बढ़ते मामलों के लिए वह स्कूल में पोषण पर अधिक ध्यान नहीं दिए जाने को भी जिम्मेदार मानती हैं।  खाने से जुड़े विकार एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं और कई बार बहुत ही खतरनाक आदतों का कारण बन जाते हैं। दिल्ली में खाने से जुड़े विकारों के लिए सलाहकार मनोचिकित्सक संजय चुघ कहते हैं, 'वे अवसाद और चिड़चिड़ापन से ग्रसित हो जाते हैं और कई बार तो शराब का सेवन भी शुरू कर देते हैं।' वह अपने अनुभवों से ऐसे मामलों के निदान से जुड़ी परेशानियों के बारे में बताते हैं। उन्होंने बताया कि कम खाने की मानसिक बीमारी से ग्रसित एक 17 वर्षीय लड़की रोजाना केवल 700-800 कैलोरी ले रही थी, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रतिदिन 1,800-2,000 कैलोरी लेना जरूरी होती हैं। वह पहले शराब का सेवन करने और अवसाद से भी ग्रसित रह चुकी थी। चुघ कहते हैं कि मानसिक परिस्थितियों और बीमारी के गंभीर हो जाने के कारण इलाज बहुत अधिक समय ले लेता है। एक बार ठीक होकर दोबारा बीमार होने से बचने के लिए जरूरी है कि समय समय पर डॉक्टर के पास जांच कराते रहें। अभी पहला और सबसे जटिल काम खुद से समस्या को पहचान लेना है। पिछले महीने मुंबई स्थित सोफिया कॉलेज में कनाडा के राष्ट्रपति जस्टिन ट्रुडो की पत्नी सोफिया ग्रैगेयर ट्रुडो का स्वागत पुष्पमालाओं से किया गया। महिला सशक्तीकरण पर बोलते हुए उन्होंने बताया कि अपनी युवावस्था में वह भी ब्युलिमिया से पीडि़त थीं। उन्होंने बताया, 'मेरे ठीक होने की शुरूआत तब हुई जब मैंने अपनी दिनचर्या के बारे में लोगों को बताना शुरू किया। मैं ठीक हुई, क्योंकि मैं बाहर निकली और सोचना शुरू किया कि बहुत हुआ, मैं खुद को नुकसान क्यों पहुंचा रही हूं।' 
 
फिल्म अभिनेत्री जैकलिन फर्नांडिस ने भी बताया था कि वह खाना ना खाकर कैसे खुद को सजा दे रही थीं और किस तरह वह इस सब से बाहर निकलीं। कॉर्डन ब्लू शेफ और रेस्टोरेंट सलाहकार के रूप में दिया सेठी की आज की जिंदगी उनकी पिछली जिंदगी से बिल्कुल अलग है। उन्होंने खुद को लगभग मार ही लिया था। उन्होंने एनोरेक्सिया, अवसाद और सामान्य जिंदगी पाने के अपने 13 वर्ष की कठिन यात्रा को बताया। वह कहती हैं, 'आदत कोई बीमारी नहीं है। यह एक बीमार मानसिक प्रणाली का परिणाम है।' एक राजनायिक की बेटी के रूप में उनके जीवन ने यह गलतफहमी भी तोड़ दी कि मानसिक विकार संसाधनों के अभाव से आते हैं। वह कहती हैं, 'हां, मुझे ये समस्याएं थीं, लेकिन वो मैं नहीं थी। मैं एक बहरूपिये की तरह हो गई थीं।' सेठी की इससे निकलने की प्रक्रिया ने भी भारत में इस समस्या की पहचान और निदान से जुड़ी समस्याओं को उजागर किया। वह कहती हैं, 'इसके निदान के लिए ना केवल वर्तमान समस्याओं बल्कि उनके कारणों को भी समाप्त करना चाहिए।' कभी खाने से दूर भागने वाली और आज हर समय खाने के इर्द-गिर्द रहने वाली दिया भारत में प्रचलित सामान्य इलाज को सही नहीं मानतीं। उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क स्थित रस्क इंस्टीट्यूट ने योगा की सहायता से आध्यात्मिक उपचार के द्वारा उनका इलाज किया। वह कहती हैं, 'भारत में गहन उपचार की कमी सबसे बड़ी समस्या है।' इन मामलों में विशेषज्ञ बीमारी का जल्द पता लगाना, लगातार उपचार और माता-पिता के सहयोग के लिए कहते हैं तो वहीं इस बीमारी से निजात पाए लोगों का कहना है कि इससे निजात पाने के लिए सबसे जरूरी है बाहर निकलना और लोगों से जुडऩा। यह बात सही है कि एनोरेक्सिया और दूसरी संबंधित बीमारियां एक गंभीर मानसिक विकार हैं और इसको स्वीकार करना ही इसके इलाज का पहला कदम है।
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